हनुमान जी में किसी जाति या वर्ण का अभिनिवेश बिल्कुल नहीं है । वे हर वर्ण का सदुपयोग करते हैं । पहले ब्राह्मण बनकर प्रभु को पहचान लिया । प्रभु से कथा और व्यथा कहकर वार्तालाप समाप्त किया । इसके बाद फिर बन्दर बन गये । आश्चर्य होता है कि अभी-अभी ब्राह्मण के रूप में दिखायी दे रहे थे, पर अब बन्दर कैसे बन गये ? किन्तु हनुमान जी बड़े चतुर हैं इसलिए बन्दर बनकर प्रस्ताव किया कि - महाराज ! आप दोनों मेरी पीठ पर बैठ जाइये । वे जानते हैं कि अगर मैंने ब्राह्मण के रूप में पीठ पर बैठाने का प्रस्ताव किया तो न तो वह उचित रहेगा और न ही प्रभु उसे स्वीकार करेंगे । इसीलिए तुरन्त कह दिया - प्रभु ! पशु के कन्धे पर बैठने में तो कोई संकोच नहीं करता, मैं तो पशु हूँ । बैठ जाइये न ! हनुमान जी को जब राक्षसों के विरूद्ध लड़ना होता है, तब क्षत्रिय बनकर क्षात्रधर्म का निर्वाह करते हैं । आगे चलकर सुग्रीव से भगवान को लेन-देन की बातें करते हुए सुनकर वे कहते हैं कि प्रभु ! लेन-देन का व्यापार (वैश्य कर्म) अगर करना हो तो आपसे ही करेंगे । शूद्र का धर्म अगर सेवा कार्य है तो शूद्र बनकर आपके चरणों की सेवा करेंगे । इस प्रकार समस्त वर्णों की सार्थकता, हनुमान जी के चरित्र में हमें दिखायी देती है ।
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