निषादराज के चरित्र में केन्द्र भावना है । और सुग्रीव का जो चरित्र है, उसमें केन्द्र शरीर है । और भगवान राम दोनों से बिल्कुल उसी प्रकार का व्यवहार करते हैं । क्या यह बहुत विलक्षण सी बात नहीं है ? अगर इसको आप समझना चाहें तो अपने दैनिक व्यवहार के माध्यम से समझ सकते हैं । आप अपने परिवार में छोटे लड़के और बड़े लड़के से एक ही प्रकार की आशा रखते हैं क्या ? अगर बड़ा लड़का आपको कुछ द्रव्य लाकर दे दे, और छोटा लड़का आपसे कुछ पैसे माँग ले, तो क्या आप अपने छोटे लड़के को यह कहकर फटकारेंगे कि तू तो बड़ा सकाम है, जो सर्वदा माँगता रहता है ? वस्तुतः यह बात आपके मन में कभी नहीं आयेगी । अपितु वास्तविकता तो यह है कि जिसने भेंट लाकर दी है, उसको भी आप स्वीकार करेंगे, उसे प्रोत्साहित करने के लिए उसके पुरुषार्थ की प्रशंसा तो करेंगे ही, पर साथ-साथ जो माँग रहा है उसके वात्सल्य तथा अपनत्व के लिए उसकी भी प्रशंसा करेंगे ।
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