Friday, 10 March 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

सुग्रीव का राज्य छिना हुआ है, पत्नी से अलग हैं, तथा डरे हुए हैं । और जब भगवान श्रीराघवेन्द्र निषादराज से मिले तब प्रभु अयोध्या के राज्य का परित्याग करके आये हुए हैं । और दोनों में अन्तर कितना है ? सुग्रीव के मन में आकांक्षा है कि मेरा राज्य और मेरी पत्नी मुझे मिले, और निषादराज के मन में इतनी निष्कामता है कि वे कन्द, मूल और फल का भेंट लेकर प्रभु के पास जाते हैं तथा भगवान से कुछ माँगते नहीं हैं । बल्कि भगवान श्रीराघवेन्द्र से अनुरोध करते हैं कि मेरे ऊपर कृपा कीजिए । अब कृपा के दो रूप हो गये । एक के प्रति कृपा का रूप यह है कि प्रभु ने उसकी सम्पत्ति, राज्य तथा पत्नी को मिला दिया और दूसरा कहता है - महाराज ! कृपा करके आप मेरे गाँव चलिये । इस वाक्य के पीछे निषादराज की भावना यह थी कि हमारे प्रभु अयोध्या का राज्य छोड़कर आये हुए हैं इसलिए प्रभु की सेवा ही करनी चाहिए । इस प्रकार सुग्रीव तथा निषादराज में बहुत अन्तर है । पर प्रभु दोनों को समान पद देते हैं तथा दोनों को एक ही शब्द *सखा* कहकर सम्बोधित करते हैं । निषादराज से प्रभु ने यही कहा - वाह मित्र ! तुमने तो बहुत बढ़िया बात कही, पर मुझे पिताजी ने दूसरी आज्ञा दी है इसलिए ऐसा आग्रह मत कीजिए क्योंकि मैं गाँव में चलने में असमर्थ हूँ । अब आप विचार करके देखिए निषादराज भला जाति की दृष्टि से कहाँ है ? मैं तो आश्चर्य करता हूँ कि लोग आजकल रामायण की सिर्फ एक पंक्ति को इतना महत्व देने लग जाते हैं और एक-एक पात्र के संदर्भ में इतने विस्तृत प्रसंग हैं उन पर दृष्टि कैसे नहीं जाती ?

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