Tuesday, 28 March 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .........

भगवान राम की जो क्रमशः यात्राएँ हैं, उनके अलग-अलग नाम हैं । विश्वामित्र के साथ उनके आश्रम तक की यात्रा *कर्मयोग* है । इसका सूत्र गीता के कर्मयोग के प्रसंग में आपको मिलेगा, जहाँ भगवान कहते हैं कि अर्जुन ! एक ओर तो कर्मयोग का त्याग संभव नहीं है और दूसरी समस्या यह है कि यदि कर्म करते हैं तो कर्म के बंधन में पड़ते हैं । परन्तु समस्या का समाधान देते हुए भगवान कहते हैं - अर्जुन ! तुम जीवन में यज्ञ-कर्म का आश्रय लो, क्योंकि जब यज्ञ-कर्म हो जायेगा तब उसका परिणाम होगा कि कर्म होते हुए भी व्यक्ति कर्म बन्धन में नहीं बँधेगा । भगवान राम की पहली यात्रा यज्ञ की रक्षा के लिए होती है । इस प्रकार यह यात्रा गीता का यज्ञकर्म ही है ।

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