Tuesday, 21 March 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

भगवान राम ने जब निषादराज के गाँव में चलना अस्वीकार कर दिया, तो निषादराज ने कहा - महाराज ! कुछ तो सेवा स्वीकार कीजिए । भगवान राम ने कहा - मित्र ! ऐसा कीजिये कि इस वृक्ष के नीचे मेरे सोने का प्रबंध कर दीजिये । निषादराज जी ने पत्ते बिछाकर ऊपर से कुश बिछा दिया तथा उसी शय्या पर भगवान राम सो गये । इसका अर्थ है कि जो निष्काम है उससे भगवान कहते हैं कि मुझे सुला दो और तुम पहरा दो । मैं दोनों तरह से तैयार हूँ । सचमुच इतना उदार भला कौन होगा जो पहरेदार बनने को भी तैयार है और पहरेदार बनाने को भी तैयार है । गोस्वामीजी ने लिखा है कि भगवान राम जब सो गये तब निषादराज तथा लक्ष्मण जी अपने-अपने अस्त्र लेकर जागकर पहरा देने लगे । उस समय दोनों जागने वालों का संवाद हो गया और कथा चलती रही । - कहते-कहते सबेरा हो गया । और भई ! कथा की सार्थकता भी यही है कि जीवन में अँधेरा मिट कर सबेरा हो जाय । और भगवान ऐसे जाग्रत श्रोता और वक्ता का भी आनंद लेते हैं ।

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