Monday, 6 March 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

किष्किन्धाकाण्ड में जब हनुमान जी भगवान राम को पहचान कर उनके चरणों को कसकर पकड़ लेते हैं, और हनुमान जी को उठाकर प्रभु ह्रदय से लगा लेते हैं और उपदेश देते हुए कहते हैं कि हनुमान ! मेरा अनन्य भक्त वही है जो समस्त ब्रह्मांड के कण-कण में मुझे देखे और अपने को दास मानकर सबकी सेवा करे । पर यह पाठ हनुमान जी को ही दिया जाने वाला पाठ है । यह पाठ सुग्रीव को नहीं दे सकते । हनुमान जी के समान जो निष्काम है, उनसे कहते हैं कि तुम सारे संसार की सेवा करो और जो सुग्रीव की तरह सकाम है उनसे कहते हैं कि मैं तुम्हें राज्य दे रहा हूँ, सम्पत्ति दे रहा हूँ, पत्नी दे रहा हूँ, जाकर राज्य का संचालन करो । पर उसमें भी एक समन्वय का सूत्र देते हुए कह दिया कि यह मत भूल जाना कि मेरी प्रिया को भी तुम्हें मिलाना है । वैसे सुग्रीव बेचारे क्या मिलायेंगे ? पर भगवान कहते हैं कि सकाम बनते हो तो संसार का सारा व्यवहार करते हुए भी भक्ति देवी का पता लगाना है, यह संकल्प लेकर व्यवहार चलाओ । और बाल-ब्रह्मचारी हनुमान जी से कहते हैं - तुम ब्रह्मचारी हो, और मैं ब्रह्म, कितना बढ़िया नाता है हमारा-तुम्हारा । और सुग्रीव से कहते हैं - हमारा-तुम्हारा तो बहुत बढ़िया नाता है, क्योंकि हम भी गृहस्थ हैं और तुम भी गृहस्थ हो । भगवान तो वस्तुतः सबके लिए हैं । कहीं वे तपस्वी के रूप में दिखायी दे रहे हैं, कहीं गृहस्थ के रूप में, तो कहीं ब्रह्म के रूप में । और प्रभु प्रत्येक व्यक्ति से कहते हैं कि आप अपने जीवन में एक मार्ग निश्चित करके उसी के द्वारा मुझे पाने और प्रसन्न करने की चेष्टा करें, तो इतने मात्र से ही मुझे पा लेंगे ।

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