सुग्रीव जी के कहने पर हनुमान जी जब ब्राह्मण बनकर भगवान राम के पास गये तो जाते ही उन्होंने प्रभु को प्रणाम किया । और जब भगवान श्रीराघवेन्द्र का राज्याभिषेक हो गया तो प्रभु ने एक दिन एकान्त में हनुमान जी से पूछा - हनुमान ! नाटक में तो जो बने उसका पूरी तरह से निर्वाह करना चाहिए । किन्तु तुम जब पहली बार ब्राह्मण बनकर आये और मैं क्षत्रिय के रूप में था तो तुम्हें यह चाहिए था कि तुम यह आशा करते कि क्षत्रिय मुझे प्रणाम करे परन्तु तुमने मुझे प्रणाम क्यों कर दिया ? वस्तुतः प्रभु तो हनुमान जी के भाव की उज्जवलता को प्रकट करने के लिए ही ऐसा प्रश्न कर रहे थे । वैसे तो प्रभु सब जानते ही हैं । प्रभु का प्रश्न सुनकर हनुमान जी ने भगवान के चरणों को कसकर पकड़ लिया और कहा - प्रभु ! यह बताइए कि ब्राह्मण की क्या यही परिभाषा है कि जो किसी को प्रणाम न करे, वह ब्राह्मण है ? जो कभी सिर न झुकावे वह ब्राह्मण है । नहीं-नहीं महाराज ? शास्त्र ब्राह्मण की यह परिभाषा नहीं करता है । अपितु शास्त्र ने तो ब्राह्मणत्व की परिभाषा करते हुए यह कहा कि जो ब्रह्म को जान ले वही ब्राह्मण है । तो महाराज ! जब मैंने आपको प्रणाम किया तो ब्रह्म समझकर प्रणाम किया था, क्षत्रिय समझकर नहीं । तो वस्तुतः सच्चा ब्राह्मण तो वही है जो ब्रह्म को पहचान ले न कि अकड़कर खड़ा हो जाये कि मैं तो ब्राह्मण हूँ । हनुमान जी ने कहा प्रभु ! उस दिन ब्राह्मणत्व का जितना सदुपयोग हुआ उतना कभी नहीं हुआ ।
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