Tuesday, 31 October 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

सबसे अधिक कठिन है 'कर्तत्व-अभिमान' को छोड़ पाना । आपने मूर्तिकार से जुड़ी यह कथा सुनी होगी । किसी भविष्यवक्ता ने एक मुर्तिशिल्पी को उसकी मृत्यु-तिथि बता दी । वह मूर्तिकार बड़ा अद्भुत शिल्पी था । उसकी बनाई गई मूर्तियाँ इतनी सजीव लगती थी कि लोगों के लिए भेद कर पाना सम्भव ही नहीं होता था कि वे पत्थर की हैं या जीवित व्यक्ति ही खड़ा है । अपनी मृत्यु की तिथि से पूर्व उस अवधि में उसने अन्य कोई मूर्तियाँ न बनाकर अपनी ही बारह मूर्तियों का निर्माण किया । और उस घोषित तिथि को वह स्वयं भी उन सब मूर्तियों के बीच जाकर बैठ गया । यमराज ने अपने दूतों को भेजा । वे आए पर खाली हाथ लौट गए । यमराज ने पूछा - उस मूर्तिकार को लेकर क्यों नहीं आए ? दूतों ने कहा - महाराज ! वहाँ तो तेरह मूर्तिकार बैठे हुए हैं बिल्कुल एक-जैसे । क्या उन सबको लाना है ? यमराज ने सुना तो उनके कानों में एक मन्त्र कहा और सचमुच वह मन्त्र बड़ा प्रभावशाली सिद्ध हुआ । यमराज के दूत आए और लौटकर कहने लगे - वाह ! ऐसा उत्कृष्ट मूर्तिकार तो विश्व में आज तक पैदा ही नहीं हुआ है जिसने ऐसी दिव्य रचना की हो । अगर वह मूर्तिकार मिल जाता तो हम उसका हाथ चूम लेते । बस इतना सुनना था कि मूर्तिकार झट-से उठकर खड़ा हो गया और कहने लगा कि मैं ही इसका निर्माता हूँ । यमदूतों ने मुस्कुराते हुए कहा - पकड़ में आ गए न ! अब चलो हमारे साथ । मूर्तियाँ तो जीवित रह गई,  पर मूर्तिकार मर गया । यह जीवन का बहुत बड़ा सत्य है । कर्तापन का अहं सत्य नहीं, अनादित्व ही सत्य है । अनादित्व ही रामायण का मूल दर्शन है ।

Monday, 30 October 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

मानस में वर्णन आता है कि श्रीभरत जब भगवान राम का राज्याभिषेक करने के लिए चित्रकूट आते हैं तो अन्य विविध आवश्यक सामग्रियों के साथ-साथ सभी तीर्थों का जल भी अपने साथ लाते हैं । पर जब यह निर्णय हो गया कि श्रीभरत को अयोध्या लौटना है तो वे भगवान राम से प्रश्न करते हैं कि प्रभु ! मैं तीर्थों के जल का क्या उपयोग करूँ ? भगवान राम कहते हैं कि भरत ! तुम जाकर महर्षि अत्रि से निवेदन करो, वे ही इस जल का सदुपयोग बतायेंगे । श्रीभरत महर्षि अत्रि से पास आते हैं और महर्षि उस जल  को एक कूप में स्थापित करवा देते हैं । आज भी चित्रकूट की यात्रा में जाने वाले यात्री बड़ी श्रद्धा से इस कूप के भी दर्शनार्थ जाते हैं । अत्रिजी ने जल को स्थापित करवाते हुए कहा कि जो यहाँ पर प्रेम से स्नान करेगा उसका जीवन पवित्र होगा और उसमें रामप्रेम का संचार होगा । इस कूप का नाम 'भरतकूप' होगा । पर महर्षि साथ ही एक बात कहना नहीं भूलते कि यद्यपि इसका नाम भरतकूप होगा, पर तुम्हें कोई भ्रम न हो जाए इसलिए मैं तुम्हें यह भी बता देना चाहता हूँ कि यह तीर्थ तो अनादि काल से है पर लोग इसे बीच में एक समय के अन्तराल में भूल गए । अब तुम्हारे द्वारा पुनर्स्थापना से विश्व का उपकार हो गया । इसका भी संकेत यही है कि जो कुछ है 'अनादि' है । और इस 'अनादित्व' को समझ लें तो अभिमान कैसा ?

Sunday, 29 October 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

हमारी पौराणिक सनातन मान्यता है कि यह सृष्टिचक्र चलता रहता है । दिन, मास, वर्ष, कल्प आदि सब चक्राकार हैं । सृष्टि बनती है, उसका विकास होता है और फिर उसका विनाश होता है । पर कर्म यहीं नहीं रुकता, पुनः उसका निर्माण होता है । भगवान शंकर और पार्वतीजी इस सत्य को जानते हैं । विवाह के समय जब मुनियों ने कहा कि 'गणेशजी का पूजन कीजिए ।' वे कह सकते थे कि माता-पिता विवाह से पूर्व अपने पुत्र का पूजन कैसे कर सकते हैं ? पर वे जब गणेशजी का पूजन करना स्वीकार कर लेते हैं, वह इस तात्विक पक्ष की ही मानो एक स्वीकृति है कि जो कुछ है, वह सब पहले से ही है, अनादि है । और आप किसी काल-विशेष में उसकी अभिव्यक्ति के माध्यम बनते हैं, अतः उस माध्यम को यह गर्व नहीं पालना चाहिए कि यह वस्तु मेरी है अथवा मैं इसका निर्माता हूँ, रचियता हूँ ।

Saturday, 28 October 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

गोस्वामीजी भगवान राम के विषय में कहते हैं कि श्री राम अनादि हैं । दूसरी ओर गोस्वामीजी संसार के लिए भी यही कहते हैं कि यह जो विश्व प्रपंच है वह अनादि है । श्री राम अनादि हैं, वेद अनादि हैं, देवतागण अनादि हैं और विधि-प्रपंच अनादि हैं, तो फिर 'आदि' क्या रह गया ? इसका अर्थ यही है कि जब 'आदि' को हम सत्य मान लेते हैं, तो हम अपने जीवन में कर्तव्य के अभिमान को अपने सिर पर लाद लेते हैं ।

Friday, 27 October 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

गोस्वामीजी ने मानस में चार घाट और उन घाटों में चार भिन्न-भिन्न वक्ताओं और श्रोताओं की परिकल्पना की । एक घाट के वक्ता हैं भगवान शंकर और श्रोता हैं पार्वतीजी । दूसरे घाट के वक्ता हैं भुशुण्डिजी जो गरुड़जी को भगवान राम की कथा सुनाते हैं । तीसरे घाट में याज्ञवल्क्य जी भरद्वाज जी को कथा सुनाते हैं । और चौथे घाट पर स्वयं गोस्वामीजी अपने मन को कथा सुनाते हैं । पूछा जा सकता है कि चार घाटों में होनेवाली इस रामकथा के रचियता कौन हैं ? तो इसके विषय में यद्यपि कहा तो यही जाता है कि मानस की रचना गोस्वामीजी ने की है, पर गोस्वामीजी स्वयं ऐसा नहीं मानते । वे कहते हैं कि यह तो भगवान शंकर की रचना है । किन्तु आप एक अद्भुत-सी बात पाएंगे कि जब भगवान शंकर पार्वतीजी को कथा सुनाते हैं तो वे कहते हैं कि पार्वती ! मैं तुम्हें वह कथा सुना रहा हूँ जिसे कागभुशुण्डि ने गरुड़ को सुनाई थी । पर जब भुशुण्डिजी गरुड़जी को सुनाते हैं तो वे कहते हैं कि यह कथा भगवान शंकर ने पार्वती जी को सुनाई थी । याज्ञवल्क्यजी भी कहते हैं कि यह उमा-शम्भु-संवाद है । पढ़कर आश्चर्य होता है कि इन चारों वक्ताओं में से कोई भी अपने आपको रचियता मानने को प्रस्तुत नहीं है । कोई भी यह दावा नहीं करता कि इस ग्रन्थ का निर्माण मेरे द्वारा हुआ । यह बड़े महत्व का सूत्र है । इसे बिना समझे भारतीय चिन्तन को ह्रदयंगम नहीं किया जा सकता है । और इसे समझने के लिए एक शब्द ऐसा है, जिसे समझना आवश्यक है । वह शब्द है - अनादि । अनादि का अर्थ है - जिसका कोई 'आदि' न हो । गोस्वामीजी इस अनादि शब्द को अनेक प्रसंगों में जोड़ देते हैं, अतः इस पर गहराई से दृष्टि डालने की आवश्यकता है ।

Thursday, 26 October 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

'मानस' के प्रति लोगों में जो प्रेम और आकर्षण है, मैं उसका अनुभव सदैव ही करता रहा हूँ । बरेली में कार्यक्रम कई महिने पहले से निर्धारित था । बाद में जब लोकसभा के चुनाव की तिथियाँ घोषित हुई तो कुछ ऐसा संयोग उपस्थित हो गया कि उस प्रसंग के समापन के दिन ही बरेली में मतदान की तिथि घोषित कर दी गई । आयोजकों को चिन्ता हुई कि तब तो उस दिन बहुत कम संख्या में लोग आ सकेंगे ! ऐसा सोचकर समापन की तिथि एक दिन आगे-पीछे रखने की बात उठी, तो मैंने उनसे कहा कि पूर्व निर्धारित दिन ही समापन रखा जाना चाहिए । क्योंकि वह बड़े महत्व का दिन है । लोग मतदान तो करेंगे ही, पर मैं देखना चाहता हूँ कि भगवान राम के पक्ष में कितना मतदान होता है । और सचमुच ! उस दिन बड़ा विलक्षण अनुभव हुआ ! उस दिन अन्य दिनों की अपेक्षा अधिक संख्या में लोग एकत्रित हुए और विशेष बात यह कि दिन में उन लोगों ने भिन्न-भिन्न उम्मीदवारों के पक्ष में मतदान किया होगा पर भगवान राम के पक्ष में वे सब एकमत थे । अतः भगवान राम के पक्ष में जो मतदान है, वह तो सार्वजनीन है और यह तो बड़े आनन्द की बात है । क्यों न हो ! भगवान श्रीराम का व्यक्तित्व ही ऐसा है ।

Wednesday, 25 October 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

श्री रामचरित्र का चित्रण, गोस्वामीजी ने 'ग्यान खानि अघ हानि कर' - पुण्य भूमि काशी और धर्मभूमि अयोध्या में रहकर किया । पर प्रभु की कृपालुता और करुणा प्राप्त करने के लिए वे चित्रकूट की प्रेमभूमि में बार-बार जाते थे और कोल-किरातों, वनचरों के प्रति प्रभु के प्रेम का स्मरण कर वे उस भावरस में निमग्न होकर एक नवीन चेतना प्राप्त कर लौटते थे । इसका तात्पर्य यह है कि ज्ञान और कर्म के साथ-साथ ईश्वर की कृपा की भी आवश्यकता है । क्योंकि ईश्वर की कृपा के बिना, ईश्वर के प्रति प्रेम के बिना जीवन में धन्यता की स्थिति नहीं आ सकती । चित्रकूट की भूमि प्रभु के निरावृत चरणों के संस्पर्श से अंकित पदचिह्नों के द्वारा व्यक्ति को प्रभु प्रेम प्रदान कर धन्य बनाती है ।

Tuesday, 24 October 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

काशी की जो भूमि है, वह गोस्वामीजी की कर्मभूमि है । मानस के अधिकांश भाग काशी में ही रचे गए । काशी के प्रति गोस्वामीजी के मन में बड़ी श्रद्धा है । यहीं पर भगवान शंकर ने उन्हें स्वप्न में 'मानस' की रचना करने का आदेश दिया । प्रारंभ में वे संस्कृत के श्लोकों में ग्रन्थ का निर्माण करने लगे । पर वे श्लोक लुप्त हो जाते । शंकरजी ने तब उन्हें 'भाषा' में रचना करने का आदेश दिया । काशी विद्वानों की भूमि है । शास्त्रों और अन्य विविध विधाओं के क्षेत्र में इसके पाण्डित्य की बड़ी प्रसिद्धि रही है । ऐसी दिव्य ज्ञान-गौरव से मण्डित भूमि में, भगवान शंकर के आदेश से 'मानस' की रचना हुई । किसी ने गोस्वामीजी से पूछ दिया कि संस्कृत में जो दिव्य ग्रन्थ है, जैसे उनके पाठ का फल दिया गया है, क्या उस दृष्टि से आपके गाँव की भाषा में लिखे गए इस ग्रन्थ को भी लोग महत्व देंगे । गोस्वामीजी ने इस सन्दर्भ में लिखा है कि यह तो भगवान शंकर और पार्वतीजी की कृपा का प्रसाद है अतः महान कल्याणप्रद है । और सचमुच आज भी लोग इसका अनुभव करते हैं । मानस की पंक्तियों को मन्त्रों से भी अधिक महत्व प्राप्त है ।

Monday, 23 October 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

कृपामय प्रभु ने चित्रकूट की भूमि में गोस्वामीजी को दर्शन दिया । सुन्दर बालक के रूप में तथा एक वीर शिकारी के रूप में, वे प्रभु के वहाँ दर्शन प्राप्त करते हैं । वहीं वे हनुमानजी के संकेत पर प्रभु को पहिचानते हैं और धन्य हो जाते हैं । 'विनयपत्रिका' में वे स्वयं इस बात का उल्लेख करते हैं । तुलसीदासजी ने चित्रकूट में भगवान को प्राप्त किया । यहीं उनका पुनर्जन्म होता है अतः चित्रकूट ही उनकी वास्तविक जन्मभूमि है । गोस्वामीजी भूलकर भी राजापूर का नाम नहीं लिखते । चित्रकूट ऐसी भावभूमि है जहाँ कोल-किरात, पशु-पक्षी सभी प्रभु को प्राप्त कर लेते हैं और इसीलिए तुलसी-जैसा असमर्थ भी वहाँ उनको प्राप्त कर सकता है । ऐसा दिव्य भाव गोस्वामीजी का चित्रकूट के प्रति है ।

Sunday, 22 October 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

हनुमानजी तुलसीदासजी से कहते हैं कि तुम भगवान की कृपा पाना चाहते हो तो तुम्हें अयोध्या में नहीं चित्रकूट के वन में जाकर रहना चाहिए । चित्रकूट अर्थात कृपा का पक्ष । यहाँ भगवान ऋषि-मुनियों के आश्रम में जाते हैं, कोल-किरातों से नाता जोड़ते हैं । अयोध्यावासी जब चित्रकूट आए तो अयोध्या और चित्रकूट की भूमि से जुड़े भावों की तुलना हो जाती है । अयोध्यावासियों को आया जानकर कोल-किरात बड़ी प्रसन्नता से उन अतिथियों के लिए कन्द-मूल-फल दोनों में भरकर ले चले और उनसे कहने लगे कि इसे आप लोग स्वीकार करें । अयोध्यावासियों का पक्ष सामने आ गया । वे विचार करते हैं कि ये बेचारे वनवासी बड़े गरीब हैं । उन्होंने सोचा होगा कि इतने धनी-समृद्ध अयोध्यावासी आए हैं तो हमारी वस्तुओं का दाम अच्छा मिलेगा । इसीलिए अयोध्यावासी उन्हें उन वस्तुओं के कई गुना दाम देने का यत्न करते हैं पर वे वनवासी उसे नहीं लेते । किसी ने उनसे पूछ दिया कि आप लोग मूल्य ले क्यों नहीं रहे हैं ? उन्होंने कहा - आप लोगों ने भगवान राम को साधना का मूल्य देकर पाया होगा, इसीलिए आप लोग मूल्य को ही महत्व देते हैं । पर हमने तो भगवान राम को बिना दाम के ही पाया है इसीलिए हम भी आपको बिना दाम ही इन वस्तुओं को दे रहे हैं ।

Saturday, 21 October 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

साधना और कृपा में बहुत बड़ा अन्तर है । वन-प्रसंग में जो वर्णन आता है उसमें यह बात स्पष्ट रूप से सामने  आ जाती है । चित्रकूट की यात्रा मानो कृपा के स्वरूप को ही प्रगट करती है । भगवान राम और केवट के बीच जो वार्तालाप होता है उससे यह ज्ञात हो जाता है कि अयोध्या की सीमा यहाँ समाप्त हो जाती है । भगवान राम के साथ केवट का जो वार्तालाप होता है, जो भाषा वहाँ सुनाई देता है वह किसी साधक की नहीं हो सकती । और यहाँ से ही प्रभु के कृपा पक्ष का श्रीगणेश करते हैं ।

Friday, 20 October 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

यन्त्रों के माध्यम से काम करनेवालों को असावधानी का दुखद अनुभव होते हुए दिखाई देता है । यन्त्रों के द्वारा बड़े-बड़े निर्माण होते हैं, बड़ी अच्छी-अच्छी वस्तुएँ यन्त्र के द्वारा बनाई जाती हैं । पर यदि यन्त्रों का उपयोग करनेवाला थोड़ा-सा भी असावधान हो जाय तो वह उपयोगी यन्त्र उस चालक को ही कुचल सकता है, मार सकता है । महाराज दशरथ अन्त में थोड़ा-सा असावधान हो गए । 'रामराज्य' के निर्माण का उनका संकल्प पूरा नहीं हो सका । बाद में यद्यपि अयोध्या में रामराज्य का निर्माण हुआ, पर इससे पूर्व रामराज्य की स्थापना चित्रकूट में हुई । अयोध्या में बाद में जो रामराज्य बना वह भरतजी के द्वारा बना । 'रामराज्य' का निर्माण चौदह वर्ष के लिए क्यों टल गया ? यह सचमुच एक विचारणीय प्रश्न है । इसका उत्तर साधना और कृपा में जो अन्तर है उसके द्वारा प्राप्त होता है ।

Thursday, 19 October 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

थोड़ा-सी असावधानी भी साधना को निष्फल कर सकती है । यही साधना की सबसे बड़ी समस्या है । किसान बड़े परिश्रम से खेत तैयार करे, बढ़िया बीज डाले और निराई करे और एक दिन जब फसल लहलहाने लगे तो जाकर सो रहे और उस समय आकर उसे पशु चर जाएँ ! अब दूसरे दिन आकर सिर पीटने से क्या लाभ ? इसी प्रकार साधना में थोड़ा-सी असावधानी से सर्वनाश हो सकता है । साधना में की गई भूल अक्षम्य है ।

Wednesday, 18 October 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

भगवान राम जब लक्ष्मणजी को कथा सुनाने लगे तो उन्होंने यही कहा कि प्रिय लक्ष्मण ! तुम मन, बुद्धि और चित्त लगाकर सुनो । प्रभु कह देते कि पूरे अन्तःकरण - मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार से सुनो ! पर उन्होंने चार में से तीन का ही नाम लिया । इसका अर्थ है कि कथा 'अहंकार' लेकर नहीं छोड़कर सुनने की आवश्यकता है । मानस-रोगों की चर्चा करते हुए गोस्वामीजी बताते हैं कि अहंकार, डमरुआ है । और जिसे यह रोग हो जाय, उसका पाचन खराब हो जाता है । इसका अर्थ यही है कि अहंकारी व्यक्ति को कथा पच नहीं सकती । वह कथा को ठीक-ठीक रूप में ग्रहण ही नहीं कर सकता । कई व्यक्ति ऐसे होते हैं जिन्हें कथा में आने पर अगली पंक्ति में बैठने का स्थान न मिले, अथवा उनके स्थान से उठाकर अन्यत्र बैठने को कह दिया जाय तो वे कथा में आना बन्द कर देते हैं । सोचिए, कथा का यही अर्थ है क्या ? यदि कोई अभिमान लेकर, अभिमान की पुष्टि के लिए कथा में आए तो उसकी कोई सार्थकता नहीं है । जब प्रभु की कथा सुननी है तो आगे, पीछे या बीच में जहाँ भी स्थान मिल जाय, बैठकर कथा सुनी जा सकती है ।

Tuesday, 17 October 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

भगवत्कथा में ऐसा दिव्य आनन्द प्राप्त होता है, ऐसी दिव्य दृष्टि प्राप्त होती है कि व्यक्ति उसमें निरन्तर निमग्न रहना चाहता है । क्योंकि कथा का अर्थ मात्र इतिहास या घटनाओं का वर्णन ही नहीं है । सन्तों ने, भक्तों ने किन-किन दृष्टियों से भगवान को देखा, उनके लीला-चरित्र को किस रूप में किसने ह्रदयंगम किया, कैसे हम उस दिव्य आनन्द को पा सकते हैं ? यह सब हम कथा के द्वारा ही प्राप्त करते हैं । कथा का हमारे जीवन में गहरा प्रभाव पड़ सकता है और इसके माध्यम से हमें ईश्वर के प्रत्यक्ष दर्शन से भी अधिक लाभ और आनन्द की प्राप्ति हो सकती है । पर इसे किस प्रकार सुनें, यह बहुत महत्वपूर्ण है । इसे केवल मनोरंजन की दृष्टि से नहीं, सही अर्थों में ग्रहण करना यदि व्यक्ति सीख ले तो जीवन में परिवर्तन हुए बिना नहीं रहेगा ।

Monday, 16 October 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

भगवान राम जब अयोध्या में सिंहासनरूढ़ हो जाते हैं तो उस समय श्री भरत एवं शत्रुघ्नजी की बस एक ही दिनचर्या है । वे हनुमानजी से कहते हैं कि प्रभु अभी विश्राम कर रहे हैं इसलिए आप हमारे साथ उपवन में चलिए । वे उपवन में हनुमानजी से कथा सुनते हैं । हनुमानजी कथा कह लेते हैं तो भरतजी उनसे कहते हैं कि महाराज ! एक प्रसंग थोड़ा ठीक से स्पष्ट नहीं हुआ, कृपया फिर से कह दीजिए ! हनुमानजी फिर से सुना देते हैं । बड़ी अनोखी बात है । बहुधा यही देखा जाता है कि कथा समाप्त होने में कभी-कभी थोड़ी देरी होने लगती है तो कुछ लोग जो घड़ी को अधिक महत्व देते हैं वे बार-बार घड़ी की ओर देखने लगते हैं कि न जाने यह कथा कब तक चलेगी ? एक दूसरी स्थिति भी दिखाई देती है । कथा सुनने के बाद आप यदि वक्ता से कह दें - महाराज ! आपने जो बताया उसमें से कुछ बातें ध्यान में नहीं रहीं, आप एक बार फिर कह दीजिए । तो इसे सुनकर वक्ता बुरा मान जायेगा । पर गोस्वामीजी कहते हैं कि वहाँ तो स्थिति ही दूसरी है - श्रोता बार-बार पूछते हैं और वक्ता भी बड़े प्रेम से बार-बार सुनाते हैं । भगवत्कथा के प्रति ऐसा दिव्य अनुराग ।

Sunday, 15 October 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

श्री हनुमानजी जैसा न कोई श्रोता है और न ही कोई वक्ता है । रामायण में वर्णन आता है कि प्रभु जब इस लोक में लीला का संवरण कर परम धाम को पधारने लगे तो हनुमानजी से उन्होंने पूछा - क्या तुम मेरे साथ चलोगे ? तो हनुमानजी ने यही कहा कि प्रभु ! जब तक इस संसार में आपकी कथा होती रहे, उसे श्रवण करने के लिए मैं यहीं रहना चाहता हूँ । कथा के प्रति ऐसा अनुराग हनुमानजी में है । कबीरदासजी ने भी ऐसी ही बात कही है । एक दिन किसी व्यक्ति ने उनकी आँखों में आँसू देखकर पूछा - महाराज ! क्या बात है, कोई दुर्घटना हो गई क्या ? कबीरदासजी ने कहा - बैकुंठ से निमंत्रण आया है, यहाँ से जाना पड़ेगा । - महाराज ! बैकुंठ तो बड़े सौभाग्य से मिलता है फिर भी आप रो रहे हैं । तब कबीरदासजी ने कहा - सत्संग में जो सुख है, वह बैकुंठ में भी नहीं है । मानस में कथा के प्रति दिव्य प्रेम का वर्णन अनेकानेक प्रसंगों में हमें प्राप्त होता है ।

Saturday, 14 October 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

माँगने के सन्दर्भ में महाभारत में भी एक कथा आती है कि अर्जुन और दुर्योधन दोनों ही माँगने के लिए भगवान कृष्ण के पास गए । भगवान कृष्ण ने कहा कि एक ओर मेरी एक अक्षौहिणी सेना है जो युद्ध करेगी । दूसरी ओर मैं हूँ और मैं जिधर रहूँगा, वहाँ केवल एक दृष्टा के रूप में उपस्थित रहूँगा, युद्ध बिल्कुल नहीं नहीं करुँगा । अब तुम दोनों जिसे चाहो चुन लो । भगवान कृष्ण ने फिर कहा कि अर्जुन छोटा है अतः उसे मैं पहले माँगने का अवसर देता हूँ । दुर्योधन ने जब यह सुना तो उसके पसीने छूट गए । वह सोचने लगा कि अर्जुन तो लड़ने वाली सेना ही मांगेगा और मेरे हिस्से में कृष्ण आ जाएँगे । अब मैं इन्हें लेकर क्या करूँगा ? पर जब अर्जुन ने न लड़नेवाले कृष्ण का चुनाव किया तो दुर्योधन अत्यंत प्रसन्न हो गया । उसने सोचा, युधिष्ठिर ने बहुत अच्छा किया जो इस मुर्ख को भेज दिया । यह केवल अर्जुन और दुर्योधन का सत्य नहीं है । हम लोगों के सामने भी यदि निष्क्रिय ईश्वर और सक्रिय संसार के बीच चुनने का अवसर आ जाय तो हम लोग भी संसार को ही चुनेंगे और चुनते हैं । भगवान को कोई नहीं लेना चाहता । हमारे जीवन का सत्य यही है ।

Friday, 13 October 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

जनश्रुति में यह कथा प्रचलित है कि प्रातःकालीन क्रिया से निवृत्ति के बाद लोटे में जो जल शेष रह जाता था उसे गोस्वामीजी एक बबूल के पेड़ में डाल देते थे । कहा जाता है कि उस वृक्ष में एक प्रेत रहता था । नित्य जल पाकर वह बहुत प्रसन्न हो गया और एक दिन गोस्वामीजी के सामने प्रगट होकर उसने कहा कि 'तुम कुछ चाहते हो तो मुझे बताओ ! मैं तुम्हारी इच्छा पूरी करने का यत्न करूँगा ।' गोस्वामीजी ने कहा कि 'मैं भगवान राम के दर्शन करना चाहता हूँ ।' भूत ने कहा कि ये तो मेरे लिए सम्भव नहीं है । मैंने भी श्रीराम के दर्शन नहीं किए हैं पर मैं उपाय बता सकता हूँ । आप इस विवाद न पड़ जाएँ कि भूत होते भी हैं या नहीं और होते हैं तो इस तरह जल डालने से वे प्रसन्न होकर प्रगट भी होते हैं या नहीं ! आप यहाँ इस सूत्र की ओर ध्यान दें जो बड़े महत्व का है और व्यक्ति को प्रेरणा देता है । संसार में अधिकांश व्यक्ति जो भगवान को मानते हैं वे बस एक ही परम्परा की दृष्टि से ही मानते हैं । क्योंकि भगवान को मानने के बाद वे उनसे वस्तुएँ ही माँगते हैं । धन-सम्पत्ति, पुत्र-पौत्र आदि की ही माँग करते हुए लोग देखे जाते हैं । अब यदि विचारपूर्वक देखें तो ये सब वस्तुएँ अल्पकालिक ही हैं, समाप्त हो जानेवाली हैं, भूत बन जानेवाली हैं । पर संसारी व्यक्ति और गोस्वामीजी में एक अन्तर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है । हम जब भगवान से भी माँगते हैं तो 'भूत माँगते हैं' पर धन्य हैं गोस्वामीजी कि जिन्होंने 'भूत से भी भगवान को माँग लिया ।' यही जीवन की धन्यता है । इसका अर्थ है कि हम लोग माँगना जानते ही नहीं ।

Thursday, 12 October 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

आगम शास्त्र में यन्त्रों के निर्माण में त्रिकोण का बड़ा महत्व है । किसी भी देवता के यन्त्र में एक सबसे भीतर भी एक त्रिकोण होता है जिसके केन्द्र में एक बिन्दु होता है और उस केन्द्रबिन्दु में स्थित उस देवता की उपासना की परम्परा आगम शास्त्र में देखी जाती है । गोस्वामीजी के जीवन में भी हमें पुण्यभूमि - अयोध्या, काशी और चित्रकूट के रूप में एक त्रिकोण दिखाई देता है जिसके मध्य में, केन्द्रबिन्दु में भगवान श्री सीताराम का सम्मिलित स्वरूप उनके आराध्य तत्व के रूप में दिखाई देता है ।

Wednesday, 11 October 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

गोस्वामीजी ने मन से जुड़ी समस्याओं को अपने जीवन में भोगा, झेला और फिर उनका समाधान जिस पद्धति से प्राप्त किया, उन सबका वर्णन उन्होंने 'रामचरितमानस' और 'विनयपत्रिका' आदि अपने ग्रन्थों में किया है । गोस्वामीजी जानते हैं कि व्यक्ति का 'मन' ही समस्याओं का केन्द्र है । मन जिससे जुड़ जाता है, वह उसी का रूप ग्रहण कर दुख-सुख की सृष्टि कर लेता है । वस्तुतः मन को किससे जोड़कर उसे स्वस्थ रखा जा सकता है, 'रामचरितमानस' में गोस्वामीजी इसी का संकेत अनेकानेक सूत्रों के द्वारा करते हैं । और भगवान राम के सनातन और शाश्वत चरित्र एवं कथा के माध्यम से वे मन की शाश्वत समस्याओं का समाधान प्रदान करते हैं ।

Tuesday, 10 October 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

गोस्वामीजी के राम कभी पुराने नहीं होते । वे ईश्वर हैं तो पहले भी रहे, आज भी हैं और भविष्य में भी रहेंगे । और जब राम हैं तो उनके साथ तुलसीदासजी भी हैं । गोस्वामीजी भगवान राम की कथा से 'रामचरितमानस' ग्रन्थ से, मन की समस्याओं का इसीलिए समाधान देने में सक्षम हुए क्योंकि मन भी किसी देश की सीमा में बँधा हुआ नहीं है, किसी काल की सीमा में बँधा हुआ नहीं है । प्रत्येक व्यक्ति के पास मन होता है । भिन्न-भिन्न काल में, भिन्न-भिन्न देशों में पैदा होनेवाले व्यक्तियों के मन का स्वरूप क्या भिन्न-भिन्न हो सकता है ? वस्तुतः मन से जुड़ी समस्याएँ और मन की प्रकृति सभी देश और काल में सदा ही उसी रूप में विद्यमान रही हैं जैसी कि आज है । अतः शाश्वत रूप में जो समस्याएँ मन के साथ सम्बद्ध है, उनका समाधान जब तक शाश्वत ईश्वर के साथ जोड़कर नहीं खोजा जाएगा, तब तक जो भी समाधान मिलेगा वह अधूरा रहेगा ।

Monday, 9 October 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

श्री राम को ईश्वर मानने का बहुत बड़ा लाभ है । मनुष्य मान लेने पर वे जितने सीमित हो जाते हैं, ईश्वर मान लेने पर वे उतने ही असीम हो जाते हैं । मनुष्य एक काल में होता है, एक देश में होता है । इस तरह वह देश-काल की सीमा से घिरा हुआ होता है । पर ईश्वर सदा-सर्वदा-सर्वत्र विद्यमान होता है । ईश्वर के लिए न तो काल की सीमा है और न ही देश की । गोस्वामीजी ने इसी विशेषता का आनन्द और लाभ लिया । उन्होंने कहा कि राम ईश्वर होते भी मनुष्य के रूप में अवतार लेते हैं और मनुष्य की भाँति आचरण करते हैं । इसमें हमें दोहरा लाभ मिलता है कि उन्हें हम मनुष्य के रूप में देखकर उनके चरित्र का अनुकरण करने का यत्न करें और जब चाहकर भी ऐसा न कर सकें, असमर्थता का अनुभव करें तो उन्हें ईश्वर के रूप में स्मरण करें और उनसे यही प्रार्थना करें कि 'प्रभु ! आप ही हमें वह शक्ति प्रदान करने की कृपा करें कि जिससे आपके आदर्शों को हम अपने जीवन में क्रियान्वित कर सकें ।

Sunday, 8 October 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

भगवान राम इस धरातल पर त्रेतायुग में अवतरित हुए  यह एक ऐतिहासिक सत्य है । पर हम जानते हैं कि ऐतिहासिक सत्य पुराना पड़ जाता है । समय-समय पर अगणित व्यक्ति आते हैं । अपने समय में उनका नाम होता है, प्रसिद्धि होती है, सम्मान होता है पर बाद में उन्हें भुला दिया जाता है । कुछ लोग कभी-कभी उन्हें भले ही स्मरण कर लें पर जनमानस में वे प्रतिष्ठित नहीं हो पाते । किन्तु हम देखते हैं कि गोस्वामीजी के राम और स्वयं गोस्वामीजी दोनों ही जनजीवन में आज भी विद्यमान हैं और निरन्तर जनमानस को प्रेरित और अनुप्राणित करते रहे हैं । इसके मूल में यही सत्य विद्यमान है कि तुलसी के राम मनुष्य नहीं, ईश्वर हैं ।

Saturday, 7 October 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

'रामचरितमानस' के अन्त में रामकथा के बाद गोस्वामीजी सबको निमंत्रण देते हुए कहते हैं कि मानस की पाँच सौ चौपाइयों को जो सुनेंगे, समझेंगे और ह्रदय में धारण करेंगे तो सारी समस्या, सारे दुःखों के मूल में जो अविद्या जनित पंच विकार (अविद्या, अस्मिता, अभिनिवेश, राग और द्वेष) हैं, प्रभु राम उनको दूर करेंगे । सचमुच ये बड़े दारुण हैं और सभी समस्याएँ इन पाँचों के द्वारा ही उत्पन्न होती हैं । श्री भरतजी भी यही कहते हैं ।

Friday, 6 October 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

वर्णन आता है कि जब विभीषणजी आए तो सुग्रीवजी ने विरोध करते हुए कहा कि प्रभु ! यह तो रावण का भाई है, राक्षस है ! न जाने किस उद्देश्य से आया है ! बाल्मीकि रामायण में भगवान राम सुग्रीवजी से कहते हैं कि तुम इसे रावण का भाई बता रहे हो, यदि स्वयं रावण भी आ गया हो तो उसे ले आओ, मैं उसका स्वागत करने के लिए प्रस्तुत हूँ । प्रभु इतने दयालु और उदार हैं कि घोषणा कर देते हैं कि जो कोई भी मेरे सामने आ जाता है उसे साधु बनाना मेरा कार्य है । इस प्रकार सर्वत्र गोस्वामीजी प्रभु की कृपा और उनकी करुणा इन दोनों को सबसे अधिक महत्व देते हैं । इसके पीछे उनका उद्देश्य व्यक्ति को पापी और बुरा बनाना नहीं है, अपितु जो अच्छे हैं उन्हें सन्देश देते हैं कि वे निरभिमानी बनकर अपनी अच्छाइयों का उपयोग करें और दूसरी ओर दोषयुक्त व्यक्ति हैं वे भी निराश न हों ! वे प्रभु के सामने जाकर अपनी असमर्थता का, अपने दोषों का वर्णन कर प्रभु से निवेदन करें कि प्रभु ! आप हमें इनसे छुटकारा दिलवाएँ ! स्वयं को एक उदाहरण के रूप में प्रस्तुत कर गोस्वामीजी, निराशा से मुक्त कर मानो, हम सबको आश्वस्त करते हैं ।

Thursday, 5 October 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

गोस्वामीजी विनयपत्रिका के एक पद में, यह बताते हुए कि संसार में हमारे द्वारा जो कार्य किये जाते हैं वे मानो नाचने के समान हैं, कहते हैं कि जीव तो ईश्वर का अंश है पर अलग होकर वह बदल गया और अब स्थिर न रहकर निरन्तर नाच रहा है । और जैसे नर्तक अनेक रूप और वेशभूषा धारण कर पुरस्कार पाने के लिए लोगों को रिझाने की चेष्टा करता है ठीक वही स्थिति जीव की भी हो गई है । गोस्वामीजी कहते हैं कि मैं संसार को रिझाने की चेष्टा में लगा रहा और आप जिस गुण से प्रसन्न होते हैं उसे भूल गया । गोस्वामीजी कहते हैं कि प्रभु ! जब हनुमानजी की ओर देखता हूँ तो लगता है कि आप वैराग्य पर रिझते हैं । जब आप पुण्यात्माओं पर प्रसन्न होते हैं तो लगता है आप पुण्य प्रिय हैं, सद्गुण प्रिय हैं । पर जब आप सुग्रीव पर प्रसन्न हो जाते हैं और बड़े से बड़े पापी को आप अपना लेते हैं, पवित्र कर देते हैं तो फिर समझ में नहीं आता कि आप किस गुण से प्रसन्न होते हैं । इसलिए प्रभु ! मेरी तो आपसे यही प्रार्थना है कि आप अपने द्वार पर इस तुलसीदास को पड़ा रहने दें । वे जानते हैं कि 'राम के द्वार' का क्या अर्थ होता है । संसार के लोगों के भी द्वार होते हैं पर वे सबके लिए और सभी समय नहीं खुले रहते, पर एक ईश्वर का द्वार ही ऐसा है कि जो सबके लिए और सभी समय खुला रहता है ।

Wednesday, 4 October 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

गोस्वामीजी बताते हैं कि गुणों या पुण्यों के आने पर व्यक्ति के जीवन में अभिमान, ईर्ष्या, द्वेष आदि अवगुण उसके सारे सद्गुणों को खा जाते हैं । अतः व्यक्ति को चाहिए कि वह सजग भाव से अपने आपको देखता रहे । अपने आपको नित्य कसता रहे, अपनी समीक्षा करता रहे । अपने अवगुणों को पहिचाने और प्रभु के चरणों में उनसे मुक्ति हेतु निवेदन करे । इसीलिए आप गोस्वामीजी के पदों में यह बात पायेंगे कि उनका प्रारंभ निराशा से होता है पर अन्त प्रभु के प्रति चरम विश्वास से होता है । और यह मानो प्रभु की कृपा का ही फल है ।

Tuesday, 3 October 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

गोस्वामीजी अपनी आलोचना स्वयं करते हैं । उन्हें अपने हर कार्य में कोई-न-कोई कमी दिखाई देती है । 'विनयपत्रिका' में वे कहते हैं - मनुष्य को सम्मान मिलता है तो उसे अच्छा लगता है । अपनी पूजा अच्छी लगती है तो दूसरों की पूजा हम करने लगें, यह तो ठीक है पर गोस्वामीजी अपने मन को जाँचते हुए कहते हैं कि अपनी पूजा तो अच्छी लगती है पर दूसरों का सम्मान करना अच्छा लगता ही नहीं । गोस्वामीजी आगे कहते हैं कि पापों को तो मैं छिपाता हूँ और जो-जो सत्कर्म बन गए हैं, यह दिखाने के लिए कि मैं बड़ा धर्मात्मा हूँ, सुनाता फिरता हूँ । और  थोड़े बहुत जो सत्कर्म होते हैं, दम्भ उसे भीतर घुसकर बलात चुरा ले जाता है । इसका अर्थ है कि हम दम्भपूर्वक अपने पुण्यों का वर्णन करते हैं और इस प्रकार दूसरों को जलाने में इसका उपयोग कर इसे गवाँ डालते हैं ।

Monday, 2 October 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

रामकथा का वर्णन करने के बाद भुशुण्डिजी ने गरुड़जी से पूछा कि बताएँ ! आप और क्या सुनना चाहते हैं ? गरुड़जी ने सात प्रश्न किए जिसमें उनका अन्तिम प्रश्न मानस रोग को लेकर था । बड़ा विचित्र-सा लगता है । कहाँ रामकथा की मधुरता और कहाँ मानस रोगों का वर्णन । पर इसमें यही सामंजस्य है कि यदि हम रामकथा सही ढंग से सुनेंगे तो अपने मन के रोग बहुत बड़े रूप में दिखाई देने लगेंगे और तब उन्हें दूर करने के लिए हम यत्न करेंगे ही । हम अपने आपको जिस सरलता से ऊँची स्थिति में होने का प्रमाणपत्र देते रहते हैं, हमारा वह भ्रम टूट जायेगा । अपने आप में रोग देखने के बाद कई लोग आतंकित हो जाते हैं, निराश होते देखे जाते हैं । पर यह ज्ञात होने पर कि अमुक-अमुक नियमों का पालन करने से तथा अमुक दवा लेने पर स्वास्थ्य लाभ किया जा सकता है, रोग का जानना व्यक्ति के लिए वरदान बन सकता है । इस तरह रोग न जानना यदि अभिशाप है तो रोग को जानकर निराश हो जाना या आत्महत्या कर लेना भी उतना ही बड़ा अभिशाप है । निराश होने के स्थान पर उसे दूर करने का यत्न करना आवश्यक है । मानस-रोगों को दूर करने के लिए गोस्वामीजी ने उपाय भी बताए हैं ।

Sunday, 1 October 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

'विनयपत्रिका' में गोस्वामीजी अपने दोषों का वर्णन करते हैं तो उसे पढ़कर लगता है कि जैसे एक रोगी किसी डॉक्टर के पास जाता है और रोग के निदान के लिए डाक्टर उसके रक्त का परीक्षण करता है । अब साधारण आँखों से रक्त के कीटाणु दिखाई नहीं देते पर डाॅक्टर एक ऐसा यन्त्र सामने रख लेता है कि जिससे वह न दिखनेवाला कीटाणु कई हजार गुना बढ़े रूप में दिखाई देने लगता है । गोस्वामीजी भी इसी पद्धति से अपने दोषों को देखते हैं । और सचमुच इसी ढंग से देखने पर ही, यदि हम रोगी हैं तो, हमारे रोग के कीटाणु हमें दिखाई देंगे अन्यथा उन्हें देख पाना सम्भव नहीं है । गोस्वामीजी 'मानस-रोगों' के सन्दर्भ में एक विलक्षण बात कहते हैं कि 'मानस रोग' के कीटाणु तो हम सबके भीतर होते ही हैं । गोस्वामीजी ने इस सत्य को जीवन में समझा और उन्होंने रामायण के माध्यम से हम सबको बहुत बड़ा सन्देश दिया । इसलिए उन्होंने रामायण का समापन रामकथा से नहीं किया । उन्होंने रामायण के अन्त में 'मानस रोगों' का वर्णन किया ।