Sunday, 29 October 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

हमारी पौराणिक सनातन मान्यता है कि यह सृष्टिचक्र चलता रहता है । दिन, मास, वर्ष, कल्प आदि सब चक्राकार हैं । सृष्टि बनती है, उसका विकास होता है और फिर उसका विनाश होता है । पर कर्म यहीं नहीं रुकता, पुनः उसका निर्माण होता है । भगवान शंकर और पार्वतीजी इस सत्य को जानते हैं । विवाह के समय जब मुनियों ने कहा कि 'गणेशजी का पूजन कीजिए ।' वे कह सकते थे कि माता-पिता विवाह से पूर्व अपने पुत्र का पूजन कैसे कर सकते हैं ? पर वे जब गणेशजी का पूजन करना स्वीकार कर लेते हैं, वह इस तात्विक पक्ष की ही मानो एक स्वीकृति है कि जो कुछ है, वह सब पहले से ही है, अनादि है । और आप किसी काल-विशेष में उसकी अभिव्यक्ति के माध्यम बनते हैं, अतः उस माध्यम को यह गर्व नहीं पालना चाहिए कि यह वस्तु मेरी है अथवा मैं इसका निर्माता हूँ, रचियता हूँ ।

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