जनश्रुति में यह कथा प्रचलित है कि प्रातःकालीन क्रिया से निवृत्ति के बाद लोटे में जो जल शेष रह जाता था उसे गोस्वामीजी एक बबूल के पेड़ में डाल देते थे । कहा जाता है कि उस वृक्ष में एक प्रेत रहता था । नित्य जल पाकर वह बहुत प्रसन्न हो गया और एक दिन गोस्वामीजी के सामने प्रगट होकर उसने कहा कि 'तुम कुछ चाहते हो तो मुझे बताओ ! मैं तुम्हारी इच्छा पूरी करने का यत्न करूँगा ।' गोस्वामीजी ने कहा कि 'मैं भगवान राम के दर्शन करना चाहता हूँ ।' भूत ने कहा कि ये तो मेरे लिए सम्भव नहीं है । मैंने भी श्रीराम के दर्शन नहीं किए हैं पर मैं उपाय बता सकता हूँ । आप इस विवाद न पड़ जाएँ कि भूत होते भी हैं या नहीं और होते हैं तो इस तरह जल डालने से वे प्रसन्न होकर प्रगट भी होते हैं या नहीं ! आप यहाँ इस सूत्र की ओर ध्यान दें जो बड़े महत्व का है और व्यक्ति को प्रेरणा देता है । संसार में अधिकांश व्यक्ति जो भगवान को मानते हैं वे बस एक ही परम्परा की दृष्टि से ही मानते हैं । क्योंकि भगवान को मानने के बाद वे उनसे वस्तुएँ ही माँगते हैं । धन-सम्पत्ति, पुत्र-पौत्र आदि की ही माँग करते हुए लोग देखे जाते हैं । अब यदि विचारपूर्वक देखें तो ये सब वस्तुएँ अल्पकालिक ही हैं, समाप्त हो जानेवाली हैं, भूत बन जानेवाली हैं । पर संसारी व्यक्ति और गोस्वामीजी में एक अन्तर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है । हम जब भगवान से भी माँगते हैं तो 'भूत माँगते हैं' पर धन्य हैं गोस्वामीजी कि जिन्होंने 'भूत से भी भगवान को माँग लिया ।' यही जीवन की धन्यता है । इसका अर्थ है कि हम लोग माँगना जानते ही नहीं ।
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