Monday, 16 October 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

भगवान राम जब अयोध्या में सिंहासनरूढ़ हो जाते हैं तो उस समय श्री भरत एवं शत्रुघ्नजी की बस एक ही दिनचर्या है । वे हनुमानजी से कहते हैं कि प्रभु अभी विश्राम कर रहे हैं इसलिए आप हमारे साथ उपवन में चलिए । वे उपवन में हनुमानजी से कथा सुनते हैं । हनुमानजी कथा कह लेते हैं तो भरतजी उनसे कहते हैं कि महाराज ! एक प्रसंग थोड़ा ठीक से स्पष्ट नहीं हुआ, कृपया फिर से कह दीजिए ! हनुमानजी फिर से सुना देते हैं । बड़ी अनोखी बात है । बहुधा यही देखा जाता है कि कथा समाप्त होने में कभी-कभी थोड़ी देरी होने लगती है तो कुछ लोग जो घड़ी को अधिक महत्व देते हैं वे बार-बार घड़ी की ओर देखने लगते हैं कि न जाने यह कथा कब तक चलेगी ? एक दूसरी स्थिति भी दिखाई देती है । कथा सुनने के बाद आप यदि वक्ता से कह दें - महाराज ! आपने जो बताया उसमें से कुछ बातें ध्यान में नहीं रहीं, आप एक बार फिर कह दीजिए । तो इसे सुनकर वक्ता बुरा मान जायेगा । पर गोस्वामीजी कहते हैं कि वहाँ तो स्थिति ही दूसरी है - श्रोता बार-बार पूछते हैं और वक्ता भी बड़े प्रेम से बार-बार सुनाते हैं । भगवत्कथा के प्रति ऐसा दिव्य अनुराग ।

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