Saturday, 14 October 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

माँगने के सन्दर्भ में महाभारत में भी एक कथा आती है कि अर्जुन और दुर्योधन दोनों ही माँगने के लिए भगवान कृष्ण के पास गए । भगवान कृष्ण ने कहा कि एक ओर मेरी एक अक्षौहिणी सेना है जो युद्ध करेगी । दूसरी ओर मैं हूँ और मैं जिधर रहूँगा, वहाँ केवल एक दृष्टा के रूप में उपस्थित रहूँगा, युद्ध बिल्कुल नहीं नहीं करुँगा । अब तुम दोनों जिसे चाहो चुन लो । भगवान कृष्ण ने फिर कहा कि अर्जुन छोटा है अतः उसे मैं पहले माँगने का अवसर देता हूँ । दुर्योधन ने जब यह सुना तो उसके पसीने छूट गए । वह सोचने लगा कि अर्जुन तो लड़ने वाली सेना ही मांगेगा और मेरे हिस्से में कृष्ण आ जाएँगे । अब मैं इन्हें लेकर क्या करूँगा ? पर जब अर्जुन ने न लड़नेवाले कृष्ण का चुनाव किया तो दुर्योधन अत्यंत प्रसन्न हो गया । उसने सोचा, युधिष्ठिर ने बहुत अच्छा किया जो इस मुर्ख को भेज दिया । यह केवल अर्जुन और दुर्योधन का सत्य नहीं है । हम लोगों के सामने भी यदि निष्क्रिय ईश्वर और सक्रिय संसार के बीच चुनने का अवसर आ जाय तो हम लोग भी संसार को ही चुनेंगे और चुनते हैं । भगवान को कोई नहीं लेना चाहता । हमारे जीवन का सत्य यही है ।

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