गोस्वामीजी अपनी आलोचना स्वयं करते हैं । उन्हें अपने हर कार्य में कोई-न-कोई कमी दिखाई देती है । 'विनयपत्रिका' में वे कहते हैं - मनुष्य को सम्मान मिलता है तो उसे अच्छा लगता है । अपनी पूजा अच्छी लगती है तो दूसरों की पूजा हम करने लगें, यह तो ठीक है पर गोस्वामीजी अपने मन को जाँचते हुए कहते हैं कि अपनी पूजा तो अच्छी लगती है पर दूसरों का सम्मान करना अच्छा लगता ही नहीं । गोस्वामीजी आगे कहते हैं कि पापों को तो मैं छिपाता हूँ और जो-जो सत्कर्म बन गए हैं, यह दिखाने के लिए कि मैं बड़ा धर्मात्मा हूँ, सुनाता फिरता हूँ । और थोड़े बहुत जो सत्कर्म होते हैं, दम्भ उसे भीतर घुसकर बलात चुरा ले जाता है । इसका अर्थ है कि हम दम्भपूर्वक अपने पुण्यों का वर्णन करते हैं और इस प्रकार दूसरों को जलाने में इसका उपयोग कर इसे गवाँ डालते हैं ।
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