गोस्वामीजी भगवान राम के विषय में कहते हैं कि श्री राम अनादि हैं । दूसरी ओर गोस्वामीजी संसार के लिए भी यही कहते हैं कि यह जो विश्व प्रपंच है वह अनादि है । श्री राम अनादि हैं, वेद अनादि हैं, देवतागण अनादि हैं और विधि-प्रपंच अनादि हैं, तो फिर 'आदि' क्या रह गया ? इसका अर्थ यही है कि जब 'आदि' को हम सत्य मान लेते हैं, तो हम अपने जीवन में कर्तव्य के अभिमान को अपने सिर पर लाद लेते हैं ।
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