हनुमानजी तुलसीदासजी से कहते हैं कि तुम भगवान की कृपा पाना चाहते हो तो तुम्हें अयोध्या में नहीं चित्रकूट के वन में जाकर रहना चाहिए । चित्रकूट अर्थात कृपा का पक्ष । यहाँ भगवान ऋषि-मुनियों के आश्रम में जाते हैं, कोल-किरातों से नाता जोड़ते हैं । अयोध्यावासी जब चित्रकूट आए तो अयोध्या और चित्रकूट की भूमि से जुड़े भावों की तुलना हो जाती है । अयोध्यावासियों को आया जानकर कोल-किरात बड़ी प्रसन्नता से उन अतिथियों के लिए कन्द-मूल-फल दोनों में भरकर ले चले और उनसे कहने लगे कि इसे आप लोग स्वीकार करें । अयोध्यावासियों का पक्ष सामने आ गया । वे विचार करते हैं कि ये बेचारे वनवासी बड़े गरीब हैं । उन्होंने सोचा होगा कि इतने धनी-समृद्ध अयोध्यावासी आए हैं तो हमारी वस्तुओं का दाम अच्छा मिलेगा । इसीलिए अयोध्यावासी उन्हें उन वस्तुओं के कई गुना दाम देने का यत्न करते हैं पर वे वनवासी उसे नहीं लेते । किसी ने उनसे पूछ दिया कि आप लोग मूल्य ले क्यों नहीं रहे हैं ? उन्होंने कहा - आप लोगों ने भगवान राम को साधना का मूल्य देकर पाया होगा, इसीलिए आप लोग मूल्य को ही महत्व देते हैं । पर हमने तो भगवान राम को बिना दाम के ही पाया है इसीलिए हम भी आपको बिना दाम ही इन वस्तुओं को दे रहे हैं ।
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