मानस में वर्णन आता है कि श्रीभरत जब भगवान राम का राज्याभिषेक करने के लिए चित्रकूट आते हैं तो अन्य विविध आवश्यक सामग्रियों के साथ-साथ सभी तीर्थों का जल भी अपने साथ लाते हैं । पर जब यह निर्णय हो गया कि श्रीभरत को अयोध्या लौटना है तो वे भगवान राम से प्रश्न करते हैं कि प्रभु ! मैं तीर्थों के जल का क्या उपयोग करूँ ? भगवान राम कहते हैं कि भरत ! तुम जाकर महर्षि अत्रि से निवेदन करो, वे ही इस जल का सदुपयोग बतायेंगे । श्रीभरत महर्षि अत्रि से पास आते हैं और महर्षि उस जल को एक कूप में स्थापित करवा देते हैं । आज भी चित्रकूट की यात्रा में जाने वाले यात्री बड़ी श्रद्धा से इस कूप के भी दर्शनार्थ जाते हैं । अत्रिजी ने जल को स्थापित करवाते हुए कहा कि जो यहाँ पर प्रेम से स्नान करेगा उसका जीवन पवित्र होगा और उसमें रामप्रेम का संचार होगा । इस कूप का नाम 'भरतकूप' होगा । पर महर्षि साथ ही एक बात कहना नहीं भूलते कि यद्यपि इसका नाम भरतकूप होगा, पर तुम्हें कोई भ्रम न हो जाए इसलिए मैं तुम्हें यह भी बता देना चाहता हूँ कि यह तीर्थ तो अनादि काल से है पर लोग इसे बीच में एक समय के अन्तराल में भूल गए । अब तुम्हारे द्वारा पुनर्स्थापना से विश्व का उपकार हो गया । इसका भी संकेत यही है कि जो कुछ है 'अनादि' है । और इस 'अनादित्व' को समझ लें तो अभिमान कैसा ?
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