Monday, 30 October 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

मानस में वर्णन आता है कि श्रीभरत जब भगवान राम का राज्याभिषेक करने के लिए चित्रकूट आते हैं तो अन्य विविध आवश्यक सामग्रियों के साथ-साथ सभी तीर्थों का जल भी अपने साथ लाते हैं । पर जब यह निर्णय हो गया कि श्रीभरत को अयोध्या लौटना है तो वे भगवान राम से प्रश्न करते हैं कि प्रभु ! मैं तीर्थों के जल का क्या उपयोग करूँ ? भगवान राम कहते हैं कि भरत ! तुम जाकर महर्षि अत्रि से निवेदन करो, वे ही इस जल का सदुपयोग बतायेंगे । श्रीभरत महर्षि अत्रि से पास आते हैं और महर्षि उस जल  को एक कूप में स्थापित करवा देते हैं । आज भी चित्रकूट की यात्रा में जाने वाले यात्री बड़ी श्रद्धा से इस कूप के भी दर्शनार्थ जाते हैं । अत्रिजी ने जल को स्थापित करवाते हुए कहा कि जो यहाँ पर प्रेम से स्नान करेगा उसका जीवन पवित्र होगा और उसमें रामप्रेम का संचार होगा । इस कूप का नाम 'भरतकूप' होगा । पर महर्षि साथ ही एक बात कहना नहीं भूलते कि यद्यपि इसका नाम भरतकूप होगा, पर तुम्हें कोई भ्रम न हो जाए इसलिए मैं तुम्हें यह भी बता देना चाहता हूँ कि यह तीर्थ तो अनादि काल से है पर लोग इसे बीच में एक समय के अन्तराल में भूल गए । अब तुम्हारे द्वारा पुनर्स्थापना से विश्व का उपकार हो गया । इसका भी संकेत यही है कि जो कुछ है 'अनादि' है । और इस 'अनादित्व' को समझ लें तो अभिमान कैसा ?

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