भगवान राम जब लक्ष्मणजी को कथा सुनाने लगे तो उन्होंने यही कहा कि प्रिय लक्ष्मण ! तुम मन, बुद्धि और चित्त लगाकर सुनो । प्रभु कह देते कि पूरे अन्तःकरण - मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार से सुनो ! पर उन्होंने चार में से तीन का ही नाम लिया । इसका अर्थ है कि कथा 'अहंकार' लेकर नहीं छोड़कर सुनने की आवश्यकता है । मानस-रोगों की चर्चा करते हुए गोस्वामीजी बताते हैं कि अहंकार, डमरुआ है । और जिसे यह रोग हो जाय, उसका पाचन खराब हो जाता है । इसका अर्थ यही है कि अहंकारी व्यक्ति को कथा पच नहीं सकती । वह कथा को ठीक-ठीक रूप में ग्रहण ही नहीं कर सकता । कई व्यक्ति ऐसे होते हैं जिन्हें कथा में आने पर अगली पंक्ति में बैठने का स्थान न मिले, अथवा उनके स्थान से उठाकर अन्यत्र बैठने को कह दिया जाय तो वे कथा में आना बन्द कर देते हैं । सोचिए, कथा का यही अर्थ है क्या ? यदि कोई अभिमान लेकर, अभिमान की पुष्टि के लिए कथा में आए तो उसकी कोई सार्थकता नहीं है । जब प्रभु की कथा सुननी है तो आगे, पीछे या बीच में जहाँ भी स्थान मिल जाय, बैठकर कथा सुनी जा सकती है ।
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