Friday, 27 October 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

गोस्वामीजी ने मानस में चार घाट और उन घाटों में चार भिन्न-भिन्न वक्ताओं और श्रोताओं की परिकल्पना की । एक घाट के वक्ता हैं भगवान शंकर और श्रोता हैं पार्वतीजी । दूसरे घाट के वक्ता हैं भुशुण्डिजी जो गरुड़जी को भगवान राम की कथा सुनाते हैं । तीसरे घाट में याज्ञवल्क्य जी भरद्वाज जी को कथा सुनाते हैं । और चौथे घाट पर स्वयं गोस्वामीजी अपने मन को कथा सुनाते हैं । पूछा जा सकता है कि चार घाटों में होनेवाली इस रामकथा के रचियता कौन हैं ? तो इसके विषय में यद्यपि कहा तो यही जाता है कि मानस की रचना गोस्वामीजी ने की है, पर गोस्वामीजी स्वयं ऐसा नहीं मानते । वे कहते हैं कि यह तो भगवान शंकर की रचना है । किन्तु आप एक अद्भुत-सी बात पाएंगे कि जब भगवान शंकर पार्वतीजी को कथा सुनाते हैं तो वे कहते हैं कि पार्वती ! मैं तुम्हें वह कथा सुना रहा हूँ जिसे कागभुशुण्डि ने गरुड़ को सुनाई थी । पर जब भुशुण्डिजी गरुड़जी को सुनाते हैं तो वे कहते हैं कि यह कथा भगवान शंकर ने पार्वती जी को सुनाई थी । याज्ञवल्क्यजी भी कहते हैं कि यह उमा-शम्भु-संवाद है । पढ़कर आश्चर्य होता है कि इन चारों वक्ताओं में से कोई भी अपने आपको रचियता मानने को प्रस्तुत नहीं है । कोई भी यह दावा नहीं करता कि इस ग्रन्थ का निर्माण मेरे द्वारा हुआ । यह बड़े महत्व का सूत्र है । इसे बिना समझे भारतीय चिन्तन को ह्रदयंगम नहीं किया जा सकता है । और इसे समझने के लिए एक शब्द ऐसा है, जिसे समझना आवश्यक है । वह शब्द है - अनादि । अनादि का अर्थ है - जिसका कोई 'आदि' न हो । गोस्वामीजी इस अनादि शब्द को अनेक प्रसंगों में जोड़ देते हैं, अतः इस पर गहराई से दृष्टि डालने की आवश्यकता है ।

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