Thursday, 5 October 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

गोस्वामीजी विनयपत्रिका के एक पद में, यह बताते हुए कि संसार में हमारे द्वारा जो कार्य किये जाते हैं वे मानो नाचने के समान हैं, कहते हैं कि जीव तो ईश्वर का अंश है पर अलग होकर वह बदल गया और अब स्थिर न रहकर निरन्तर नाच रहा है । और जैसे नर्तक अनेक रूप और वेशभूषा धारण कर पुरस्कार पाने के लिए लोगों को रिझाने की चेष्टा करता है ठीक वही स्थिति जीव की भी हो गई है । गोस्वामीजी कहते हैं कि मैं संसार को रिझाने की चेष्टा में लगा रहा और आप जिस गुण से प्रसन्न होते हैं उसे भूल गया । गोस्वामीजी कहते हैं कि प्रभु ! जब हनुमानजी की ओर देखता हूँ तो लगता है कि आप वैराग्य पर रिझते हैं । जब आप पुण्यात्माओं पर प्रसन्न होते हैं तो लगता है आप पुण्य प्रिय हैं, सद्गुण प्रिय हैं । पर जब आप सुग्रीव पर प्रसन्न हो जाते हैं और बड़े से बड़े पापी को आप अपना लेते हैं, पवित्र कर देते हैं तो फिर समझ में नहीं आता कि आप किस गुण से प्रसन्न होते हैं । इसलिए प्रभु ! मेरी तो आपसे यही प्रार्थना है कि आप अपने द्वार पर इस तुलसीदास को पड़ा रहने दें । वे जानते हैं कि 'राम के द्वार' का क्या अर्थ होता है । संसार के लोगों के भी द्वार होते हैं पर वे सबके लिए और सभी समय नहीं खुले रहते, पर एक ईश्वर का द्वार ही ऐसा है कि जो सबके लिए और सभी समय खुला रहता है ।

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