Sunday, 15 October 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

श्री हनुमानजी जैसा न कोई श्रोता है और न ही कोई वक्ता है । रामायण में वर्णन आता है कि प्रभु जब इस लोक में लीला का संवरण कर परम धाम को पधारने लगे तो हनुमानजी से उन्होंने पूछा - क्या तुम मेरे साथ चलोगे ? तो हनुमानजी ने यही कहा कि प्रभु ! जब तक इस संसार में आपकी कथा होती रहे, उसे श्रवण करने के लिए मैं यहीं रहना चाहता हूँ । कथा के प्रति ऐसा अनुराग हनुमानजी में है । कबीरदासजी ने भी ऐसी ही बात कही है । एक दिन किसी व्यक्ति ने उनकी आँखों में आँसू देखकर पूछा - महाराज ! क्या बात है, कोई दुर्घटना हो गई क्या ? कबीरदासजी ने कहा - बैकुंठ से निमंत्रण आया है, यहाँ से जाना पड़ेगा । - महाराज ! बैकुंठ तो बड़े सौभाग्य से मिलता है फिर भी आप रो रहे हैं । तब कबीरदासजी ने कहा - सत्संग में जो सुख है, वह बैकुंठ में भी नहीं है । मानस में कथा के प्रति दिव्य प्रेम का वर्णन अनेकानेक प्रसंगों में हमें प्राप्त होता है ।

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