साधना और कृपा में बहुत बड़ा अन्तर है । वन-प्रसंग में जो वर्णन आता है उसमें यह बात स्पष्ट रूप से सामने आ जाती है । चित्रकूट की यात्रा मानो कृपा के स्वरूप को ही प्रगट करती है । भगवान राम और केवट के बीच जो वार्तालाप होता है उससे यह ज्ञात हो जाता है कि अयोध्या की सीमा यहाँ समाप्त हो जाती है । भगवान राम के साथ केवट का जो वार्तालाप होता है, जो भाषा वहाँ सुनाई देता है वह किसी साधक की नहीं हो सकती । और यहाँ से ही प्रभु के कृपा पक्ष का श्रीगणेश करते हैं ।
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