रामकथा का वर्णन करने के बाद भुशुण्डिजी ने गरुड़जी से पूछा कि बताएँ ! आप और क्या सुनना चाहते हैं ? गरुड़जी ने सात प्रश्न किए जिसमें उनका अन्तिम प्रश्न मानस रोग को लेकर था । बड़ा विचित्र-सा लगता है । कहाँ रामकथा की मधुरता और कहाँ मानस रोगों का वर्णन । पर इसमें यही सामंजस्य है कि यदि हम रामकथा सही ढंग से सुनेंगे तो अपने मन के रोग बहुत बड़े रूप में दिखाई देने लगेंगे और तब उन्हें दूर करने के लिए हम यत्न करेंगे ही । हम अपने आपको जिस सरलता से ऊँची स्थिति में होने का प्रमाणपत्र देते रहते हैं, हमारा वह भ्रम टूट जायेगा । अपने आप में रोग देखने के बाद कई लोग आतंकित हो जाते हैं, निराश होते देखे जाते हैं । पर यह ज्ञात होने पर कि अमुक-अमुक नियमों का पालन करने से तथा अमुक दवा लेने पर स्वास्थ्य लाभ किया जा सकता है, रोग का जानना व्यक्ति के लिए वरदान बन सकता है । इस तरह रोग न जानना यदि अभिशाप है तो रोग को जानकर निराश हो जाना या आत्महत्या कर लेना भी उतना ही बड़ा अभिशाप है । निराश होने के स्थान पर उसे दूर करने का यत्न करना आवश्यक है । मानस-रोगों को दूर करने के लिए गोस्वामीजी ने उपाय भी बताए हैं ।
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