गोस्वामीजी बताते हैं कि गुणों या पुण्यों के आने पर व्यक्ति के जीवन में अभिमान, ईर्ष्या, द्वेष आदि अवगुण उसके सारे सद्गुणों को खा जाते हैं । अतः व्यक्ति को चाहिए कि वह सजग भाव से अपने आपको देखता रहे । अपने आपको नित्य कसता रहे, अपनी समीक्षा करता रहे । अपने अवगुणों को पहिचाने और प्रभु के चरणों में उनसे मुक्ति हेतु निवेदन करे । इसीलिए आप गोस्वामीजी के पदों में यह बात पायेंगे कि उनका प्रारंभ निराशा से होता है पर अन्त प्रभु के प्रति चरम विश्वास से होता है । और यह मानो प्रभु की कृपा का ही फल है ।
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