Tuesday, 24 October 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

काशी की जो भूमि है, वह गोस्वामीजी की कर्मभूमि है । मानस के अधिकांश भाग काशी में ही रचे गए । काशी के प्रति गोस्वामीजी के मन में बड़ी श्रद्धा है । यहीं पर भगवान शंकर ने उन्हें स्वप्न में 'मानस' की रचना करने का आदेश दिया । प्रारंभ में वे संस्कृत के श्लोकों में ग्रन्थ का निर्माण करने लगे । पर वे श्लोक लुप्त हो जाते । शंकरजी ने तब उन्हें 'भाषा' में रचना करने का आदेश दिया । काशी विद्वानों की भूमि है । शास्त्रों और अन्य विविध विधाओं के क्षेत्र में इसके पाण्डित्य की बड़ी प्रसिद्धि रही है । ऐसी दिव्य ज्ञान-गौरव से मण्डित भूमि में, भगवान शंकर के आदेश से 'मानस' की रचना हुई । किसी ने गोस्वामीजी से पूछ दिया कि संस्कृत में जो दिव्य ग्रन्थ है, जैसे उनके पाठ का फल दिया गया है, क्या उस दृष्टि से आपके गाँव की भाषा में लिखे गए इस ग्रन्थ को भी लोग महत्व देंगे । गोस्वामीजी ने इस सन्दर्भ में लिखा है कि यह तो भगवान शंकर और पार्वतीजी की कृपा का प्रसाद है अतः महान कल्याणप्रद है । और सचमुच आज भी लोग इसका अनुभव करते हैं । मानस की पंक्तियों को मन्त्रों से भी अधिक महत्व प्राप्त है ।

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