श्री रामचरित्र का चित्रण, गोस्वामीजी ने 'ग्यान खानि अघ हानि कर' - पुण्य भूमि काशी और धर्मभूमि अयोध्या में रहकर किया । पर प्रभु की कृपालुता और करुणा प्राप्त करने के लिए वे चित्रकूट की प्रेमभूमि में बार-बार जाते थे और कोल-किरातों, वनचरों के प्रति प्रभु के प्रेम का स्मरण कर वे उस भावरस में निमग्न होकर एक नवीन चेतना प्राप्त कर लौटते थे । इसका तात्पर्य यह है कि ज्ञान और कर्म के साथ-साथ ईश्वर की कृपा की भी आवश्यकता है । क्योंकि ईश्वर की कृपा के बिना, ईश्वर के प्रति प्रेम के बिना जीवन में धन्यता की स्थिति नहीं आ सकती । चित्रकूट की भूमि प्रभु के निरावृत चरणों के संस्पर्श से अंकित पदचिह्नों के द्वारा व्यक्ति को प्रभु प्रेम प्रदान कर धन्य बनाती है ।
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