Thursday, 25 January 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ....

पुराणों में जिनका राक्षसों या दैत्यों के रूप में वर्णन किया गया है और जिन्हें हम खलनायक या दुर्गुण-दुर्विचारों के रूप में देखते हैं, उनके जीवन में भी अमृत या सद्गुण पक्ष दिखाई देते हैं । उनके विषय में कभी-कभी बड़े जोर-शोर के साथ इस पक्ष पर बल दिया जाता है । किसी ने तो गोस्वामीजी पर ऐसा भी आक्षेप किया कि वे श्रीराम के इतने पक्षपाती थे कि उन्होंने रावण के महान गुणों का वर्णन ही नहीं किया, उनकी महानता का उल्लेख ही नहीं किया । ठीक है, परन्तु गोस्वामीजी ही क्यों, यह पक्षपात तो भगवान विष्णु से शुरु हो गया । नारद जब रुष्ट हुए, तो भगवान पर यही आक्षेप किया कि तुम्हारे जैसा विचित्र बँटवारा करनेवाला दूसरा कोई नहीं होगा । जब परिश्रम देवता और दैत्य ने समान रूप मिलकर किया है, तो पुरस्कार का अमृत का बँटवारा भी तो बराबरी का ही होना चाहिए या नहीं ? पर तुमने प्रयत्न यही किया कि अमर देवता ही हों, दैत्य अमर न हो सकें । अब यह भगवान का पक्षपात है या नहीं ? लोकहित के लिए इस प्रकार का पक्षपात आवश्यक है या नहीं ? इसके अंतरंग तत्व पर विचार करें तो लगेगा कि इसका तात्पर्य बिल्कुल ही भिन्न है और यही जीवन का सत्य भी है । क्या जीवन में समान परिश्रम करने पर भी प्रत्येक व्यक्ति को एक ही स्थिति प्राप्त होती है ? मनःस्थिति की दृष्टि से प्रत्येक व्यक्ति एक ही जैसा कर्म करे तो क्या उन्हें एक जैसा ही फल मिलता है ? नहीं मिलता । अभिप्राय यह कि केवल समान श्रम का नहीं, बल्कि वस्तुतः पात्रता का महत्व है । भगवान का तात्पर्य यह था कि जिसे अमृत प्राप्त नहीं होना चाहिए उसको यदि अमरता मिल जाए तो यह न तो समाज के लिए हितकर होगा और न ही उसके लिए ही ।

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