Wednesday, 10 January 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

बालि से लड़ने के लिए सुग्रीव प्रभु का बल लेकर गये, तो बेचारे हार क्यों गये ? यदि आप दूध लेने को फूटा लोटा लेकर किसी के पास जाएँ और वह उसे दूध से भर दे, पर घर आते तक सारा दूध बह जाए, तो देनेवाले का क्या दोष ? सुग्रीव जब लड़ने चला तो वह भी सोचने लगा कि बालि इतना बलशाली है, क्या केवल भगवान के बल से हम उसे हरा पायेंगे ? उसे भगवान के बल पर भी सन्देह हुआ और उसने एक चतुराई की । उसने सोचा कि ठीक है, भगवान का बल तो है ही, उसमें थोड़ा-सा अपना छल भी मिला दें, यह छल ही सबसे बड़ा छेद है । अपना छल पहले, ईश्वर का बल बाद में, मानो सुग्रीव का विश्वास स्थिर नहीं है, उसमें छल-छिद्र है और उस छिद्र वाले बर्तन में इतना बल दिया, इतनी कृपा दी, फिर भी उसने सब खो दिया, बालि से हार गया । इस संघर्ष में बालि विजयी हुआ, तब सुग्रीव के मन में निराशा हुई और भगवान के प्रति अनन्य शरणागति का भाव उदय हुआ । लगा कि प्रभो,  अब तो आप ही मुझे बचा सकते हैं, आप ही मेरी रक्षा कीजिए । भगवान ने बाण चलाया और सुग्रीव की रक्षा हो गई ।

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