Saturday, 6 January 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

विश्वास को पात्र कहा गया । इसका अभिप्राय क्या है ? यह कि ईश्वर में अनन्त सामर्थ्य है, लेकिन जीव में उसे ग्रहण करने की जितनी क्षमता होगी, उसी क्षमता की सीमा तक वह उसे ग्रहण कर सकता है । सुग्रीव के चरित में भी यही सत्य दिखाई पड़ता है । भगवान तो महान हैं, पर पात्र छोटा निकला । भगवान राम ने सुग्रीव से कहा - अच्छा, अब तो तुम्हें विश्वास हो गया कि मैं बालि को मारूँगा ? हाँ महाराज, हो गया - तो अब तुम एक काम करो, किष्किन्धापुरी जाकर बालि के महल के सामने जरा गर्जना तो करो, बालि को चुनौती दो । सुग्रीव प्रभु का मुँह देखने लगे, बोले - प्रभो, आपने ने कहा था कि बालि को मैं मारूँगा । अब उसे चुनौती मैं दूँगा कि आप ? भगवान बोले - मारूँगा मैं, पर चुनौती तुम दोगे, तुम लड़ोगे । यह बड़ा अनोखा तत्वज्ञान है । गीता में भगवान अर्जुन से कहते हैं कि कर्म तुम करोगे और उसका फल मैं दूँगा । भगवान कहते हैं - कर्म से हम तुमको भागने नहीं देंगे, लड़ना तो तुम्हें ही पड़ेगा, पर उसका परिणाम का अधिकार तुम्हारे पास नहीं, मेरे पास है ।

No comments:

Post a Comment