बालि और सुग्रीव में एक अनोखा अन्तर है । सुग्रीव जिस बात को बहुत कठिनाई से समझ पाए थे, बालि उसे न जाने कब से जानता था । श्रीराम के ईश्वरत्व को पहचानने में सुग्रीव को समय लगा । परन्तु लगता है कि बालि भगवान से भलीभाँति परिचित है । जब वह सुग्रीव से लड़ने चला तो तारा ने उसके पैर पकड़ लिए और कहा कि नाथ, क्या आपने सुग्रीव की गर्जना नहीं सुनी ? यह गर्जना बता रही है कि उसके पीछे किसी का बल है । शायद आपको पता नहीं कि सुग्रीव से जिनकी मित्रता हो गई है, वे महान बलशाली हैं । तारा ने सोचा था कि इस सूचना से बालि डर जाएगा, पर बालि का उत्तर क्या बताता है ? बताता है कि उसे ईश्वर का ज्ञान है । तारा बालि की बात पर हँसते हुए बोला कि तुम उन्हें मनुष्य कह रही हो, बलवान व्यक्ति कह रही हो, मुझे तो तुम्हारी बुद्धि पर तरस आ रहा है । अरे, मनुष्य नहीं, बलवान राजकुमार नहीं, वे तो साक्षात ईश्वर हैं । जानने की यह पद्धति सुग्रीव के चरित्र में लम्बी है, परन्तु बालि के जीवन में यह ज्ञान बिल्कुल स्पष्ट है कि वे भगवान हैं । सुग्रीव को भगवान की भवगत्ता पर जितना विश्वास है, बालि को उससे कहीं अधिक है । इसे यों कह सकते हैं कि बालि का ग्रहणपात्र बड़ा है, सुग्रीव का उसकी तुलना में छोटा है । यही बालि के जीवन का एक उज्ज्वल पक्ष है, पर इसके साथ ही उनके जीवन में दुर्बलता भी है ।
......शेष कल ....
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