Tuesday, 23 January 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

समुद्र-मंथन के संदर्भ में जो रूपक सामने आया है, उसमें एक सामंजस्य का स्वरूप प्रस्तुत किया गया है । अमृत की आवश्यकता देवता और दैत्यों दोनों के अन्तःकरण में विद्यमान है और दोनों ही पक्ष अमृतत्व प्राप्ति के लिए पुरुषार्थ करते दिखाई देते हैं । पर अन्तर यही है कि देवता जिस अमृत को भगवान की सहायता और सत्कर्म के मार्ग से पाना चाहते हैं, वहीं पर राक्षसों के समक्ष मार्ग की समस्या को लेकर कोई द्वन्द नहीं है । उन्हें तो अमृत चाहिए । चाहे जिस मार्ग से और जैसे भी । भगवान ने प्रयास यह किया कि सद्गुणों के रूप में जो देवता हैं, वे तो अमर हो जायें और दुर्गुण रूप राक्षसों का विनाश हो जाय । सांकेतिक भाषा है कि जीवन में प्रयत्न यह करना है कि हमारे जीवन में सद्गुण तो अमर हो जाएँ, पर दुर्गुण न अमर हो सकें ।

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