अंगद बालि का पुत्र है, पर अंगद में एक विशेषता है । बालि जीवनभर स्वयं को अभिमान से मुक्त नहीं कर सका । बल्कि यों कह सकते हैं कि बालि जैसे सद्गुण संपन्न व्यक्ति का सबसे बड़ा दोष उसका अभिमान था । बालि अपने जीवन के अंतिम क्षणों में उस अभिमान का परित्याग करने में समर्थ होता है । वह अपने अहंकार को भगवान के चरणों में अर्पित कर देता है और ममता के केन्द्र अपने पुत्र अंगद को भगवान के सामने उपस्थित करता है । अंगद की प्रशंसा करते हुए बालि ने सबसे पहले यही कहा, प्रभो ! मेरा यह पुत्र बड़ा विनयी और बलवान है । विनयी और बलवान इन दोनों शब्दों के प्रयोग करने में बालि का तात्पर्य यह था कि कई लोग बड़े विनम्र तो होते हैं, पर स्वयं निर्बल होते हैं । अतः संसार में प्रायः निर्बलों में ही विनम्रता देखी जाती है और दूसरी ओर जो बलवान होते हैं उनमें बहुधा अपने बल का गर्व है । बल और विनय का सामंजस्य बड़ा ही दुर्लभ है । पर बालि ने अंगद की जो समीक्षा प्रस्तुत की, उसमें यही कहा कि महाराज ! यह विनयी भी है और बलवान भी ।
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