Saturday, 20 January 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ....

बालि सर्वश्रेष्ठ पुण्य का प्रतीक है, क्योंकि इन्द्र का पद सर्वश्रेष्ठ पुण्यात्मा को प्राप्त होता है । पर उस पुण्य के साथ अभिमान जुड़ा हुआ है । बालि के पुत्र होने के नाते अंगद में बालि का वह पुण्य का अंश तो है, पर उसका पुण्याभिमान पूरी तरह से मिट चुका है । ऐसी स्थिति में यह कह सकते हैं कि अंगद बालि के पुण्य का परिशुद्ध रूप है, क्योंकि उसमें अभिमान का मैल नहीं है और पुण्य के परिणामस्वरूप विनम्रता का गुण भी अंगद में विद्यमान है । इसलिए बालि के देहत्याग के बाद भगवान श्रीराम लक्ष्मणजी को आदेश देते हैं कि वे किष्किन्धा जाकर सुग्रीव का राजतिलक करें और अंगद को युवराज पद दें । और इतना ही नहीं, बाद में जब वे सुग्रीव को आदेश देते हैं कि तुम किष्किन्धा का राज्य चलाओ, तो यह कहना नहीं भूलते कि ध्यान रहे कि किष्किन्धा का राज्य तुम्हें अकेले नहीं, अंगद को साथ लेकर उसकी सहमति से चलाना है ।

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