Tuesday, 16 January 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ....

जब भगवान राम ने बालि से जीवित रहने के लिए कहा तब बालि के विचार और भावुकता दोनों इतने अद्भुत रूप से सामने आईं कि उन्होंने मना कर दिया । उन्होंने दो कारणों से भगवान का प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया । एक तो उनको लगा कि मैं जीवित रहकर प्रभु के लिए समस्या पैदा करुँगा । क्या ? बोले कि वे सुग्रीव को कह चुके हैं कि बालि को मैं एक ही बाण से मारूँगा और वह बेचारा न जाने कब से सिंहासन पर बैठने की कल्पना कर रहा होगा । मैं जीवित रहा, तो प्रभु का वचन पूरा नहीं होगा । उनका वचन पूरा होना चाहिए । दूसरी बात यह कि बालि ने प्रभु से कहा, प्रभो, आप मुझसे जीवित रहने के लिए कह रहे हैं, तो समझ गया कि आप मुझसे पूरी तरह से प्रसन्न नहीं हैं । भगवान बोले कि बालि, यह तुम क्या कह रहे हो ? ईश्वर कह रहा है कि तुम जीवित रहो और तुम कह रहे हो कि ईश्वर प्रसन्न नहीं है । बालि ने कहा कि नहीं, महाराज ! शायद आपको लगता होगा कि मैं 'अहम्' के केन्द्र बने हुए इस देह को ही सब कुछ मानता हूँ । क्योंकि व्यक्ति जब वह 'मैं' कहता है, तो वह 'मैं' को शरीर रूप में देखता है । तो प्रभो, भले ही मैं कभी देहाभिमानी रहा होऊँ, पर आपको विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि अब ऐसी बात नहीं है । बालि ने कहा कि महाराज, यदि आपको लगता है कि अब भी मेरे पाप बचे हुए हैं, तो मैं चाहता हूँ कि मेरा जन्म हो, परन्तु एक वरदान आप मुझे अवश्य दीजिए, जन्म-जन्मांतर में आपके चरणों में मेरा प्रेम बना रहे ।

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