जब साक्षात भगवान बालि से जीवित रहने के लिए कहते हैं तब बालि ने मना कर दिया और कहा कि एक वरदान आप मुझे अवश्य दीजिए, जन्म-जन्मांतर में आपके चरणों में मेरा प्रेम बना रहे । भगवान भाव-विभोर हो जाते हैं । पहले बालि से सुग्रीव हारा, फिर भगवान से बालि हारा, पर अन्त में अब बालि से भगवान हार जाते हैं । इस देहाभिमान से मुक्ति, अहम् का ऐसा त्याग कि जीवन में रंचमात्र भी ममता न हो । बालि ने अपनी अहंता और ममता का सर्वश्रेष्ठ उपयोग किया । अहम् था शरीर में और ममता थी अपने बेटे में । उसने दोनों को दो स्थानों में लगा दिया । अपनी अहंता को बालि ने देहाभिमान से मुक्त होकर अपने प्राणों की माला भगवान के चरणों में चढ़ा दी । और अंगद का हाथ प्रभु के हाथ में देकर बोले, यह मेरी ममता रहे आपके कर-कमलों में ।
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