Wednesday, 17 January 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ...

जब साक्षात भगवान बालि से जीवित रहने के लिए कहते हैं तब बालि ने मना कर दिया और कहा कि एक वरदान आप मुझे अवश्य दीजिए, जन्म-जन्मांतर में आपके चरणों में मेरा प्रेम बना रहे । भगवान भाव-विभोर हो जाते हैं । पहले बालि से सुग्रीव हारा, फिर भगवान से बालि हारा, पर अन्त में अब बालि से भगवान हार जाते हैं । इस देहाभिमान से मुक्ति, अहम् का ऐसा त्याग कि जीवन में रंचमात्र भी ममता न हो । बालि ने अपनी अहंता और ममता का सर्वश्रेष्ठ उपयोग किया । अहम् था शरीर में और ममता थी अपने बेटे में । उसने दोनों को दो स्थानों में लगा दिया । अपनी अहंता को बालि ने देहाभिमान से मुक्त होकर अपने प्राणों की माला भगवान के चरणों में चढ़ा दी । और अंगद का हाथ प्रभु के हाथ में देकर बोले, यह मेरी ममता रहे आपके कर-कमलों में ।

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