सुग्रीव के जीवन में बीच-बीच में एक-एक कमी दिखाई देती है और वह क्रमशः दूर होती जाती है, पर बालि के चरित्र में मानो एक क्षण में सब कुछ हो गया । उसकी छाती पर जब भगवान का बाण लगा, तो क्षणभर में कितना बड़ा परिवर्तन हो गया । उसने एक ऐसी लम्बी छलाँग लगाई कि सुग्रीव को जो जीवनभर में नहीं मिला, वह उसे क्षणभर में मिल गया । इसका सूत्र यह है कि अहंता और ममता यानि 'मैं' और 'मेरा' का भाव जीवन में दो ही चीजों का त्याग सबसे कठिन है - जो व्यक्ति अहम् और मम से मलिन है, उसके लिए ब्रह्मसुख अगम है ।
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