विचार के द्वारा कर्म की उपेक्षा हो या कर्म का परिणाम विचार की उपेक्षा हो, तो ये दोनों ही व्यक्ति और समाज के जीवन में अधूरे सत्य के परिचायक हैं । इसके पीछे एक रहस्य है और रामायण और महाभारत में भी इस सत्य की ओर ध्यान दिलाया गया है । महाभारत में कर्ण और अर्जुन दोनों सगे भाई हैं, महाभारत में कर्ण सूर्य के पुत्र हैं और अर्जुन इन्द्र के । वहाँ दोनों भाइयों का जन्म एक ही माता के गर्भ से हुआ । दोनों सगे भाई थे, अतः दोनों में घनिष्ठ प्रेम होना चाहिए था। रामायण में भी बालि और सुग्रीव दोनों सगे भाई हैं, अतः उनमें परस्पर प्रेम होना चाहिए था, परन्तु महाभारत में समस्या यह आती है कि अर्जुन और कर्ण में टकराहट है और रामायण में भी यद्यपि बालि और सुग्रीव प्रारंभ में तो जुड़े हुए थे, परन्तु आगे चलकर उनमें भी भेद उत्पन्न हो गया, शत्रुता पैदा हो गई । रामायण और महाभारत दोनों में ये जो दृष्टांत हैं, ये जीवन के इसी सत्य को प्रकट करते हैं और यह समस्या बड़ी जटिल है कि कर्म और विचार कैसे एक दूसरे के पूरक हों । कर्म और विचार तो सगे भाई के समान हैं, परन्तु जब वे प्रेम के साथ एक-दूसरे के पूरक होकर रहें, तभी व्यक्ति के जीवन को सच्चे अर्थों में पूर्ण कहा जा सकता है ।
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