Monday, 15 January 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

भगवान जब भी अंगद को याद करते हैं, उन्हें बालि की याद आ जाती है और इसलिए वे अंगद को बालिपुत्र कहकर ही सम्बोधित करते हैं । बालि जीवनभर विजेता रहा और अन्त में भी वह सुग्रीव से बाजी मार ले गया । कैसे ? जब बालि ने भगवान से पूछा कि मेरा अपराध क्या है । भगवान ने कहा कि तुम बड़े अभिमानी हो । तब बालि ने बड़े कोमल शब्दों में भगवान से केवल यही निवेदन किया कि प्रभो, मैं अभिमानी तो अवश्य था, पर आपके सामने आने के बाद भी, आपका बाण लगने के बाद भी क्या मैं अभिमानी बना हुआ हूँ ? और यदि बना हुआ हूँ तो इसका अर्थ यह हुआ कि अभिमान आपसे बड़ा है । आपकी विलक्षणता तो यही है न कि आपके सम्मुख होते ही अभिमान नष्ट हो जाता है ? तो फिर बताइए कि क्या मैं अभिमानी हूँ ? भगवान बालि की बात सुनकर तत्काल समझ गए और उन्होंने बालि के मस्तक पर हाथ रखकर कहा कि नहीं, नहीं, मैं अपनी योजना वापस लेता हूँ, अब मेरी इच्छा तुम्हें मारने की नहीं है, मैं चाहता हूँ कि तुम शरीर से अचल हो जाओ, शरीर की रक्षा करो । कितना बड़ा प्रलोभन है ? व्यक्ति में मृत्यु से बचने का प्रलोभन कितना बड़ा होता है ? और जब साक्षात भगवान बालि से जीवित रहने के लिए कह रहे हैं । परन्तु बालि के विचार और भावुकता दोनों इतने अद्भुत रूप से सामने आईं कि उन्होंने मना कर दिया ।

No comments:

Post a Comment