समुद्र-मंथन का रूपक गोस्वामीजी को अत्यंत प्रिय है, वे कई प्रसंगों में इसका उल्लेख करते हैं और भगवान राम के वन-गमन को भी उन्होंने समुद्र-मंथन के रूप में प्रस्तुत किया है । वेद केे अध्ययन को भी वे समुद्र-मंथन के रूप में ही प्रस्तुत करते हैं । इसका अभिप्राय यह है कि जीवन के विविध क्षेत्रों में यह अमृत-मंथन की प्रक्रिया चलनी चाहिए । भगवान ने कहा - समुद्र में रत्न है, उसे प्रगट करना है । सब कुछ होते भी जब तक उसे प्रगट न किया जाए, तब तक उसका लाभ क्या है ? जैसे पृथ्वी में सोना भी छिपा हुआ है, लोहा भी और कोयला भी, पर जब तक उसे पृथ्वी के अन्तराल से बाहर प्रकट न किया जाए, तब तक उसके होने भर से क्या लाभ ? भगवान कहते हैं कि समुद्र में सारी वस्तुएँ छिपी हुई हैं, तुम सब मिलकर मन्थन करके उसे प्रकट करो । यह मन्थन क्या है ? यही कर्म है । इसका अर्थ है कि व्यक्ति अगर संसार में प्रयत्न नहीं करेगा, पुरूषार्थ नहीं करेगा, कर्म नहीं करेगा और बिना प्रयत्न किये ही वह कल्पना करे कि हम जीवन में अमृतत्व प्राप्त कर लेंगे, तो यह सम्भव नहीं है ।
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