Tuesday, 9 January 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

गोस्वामीजी ने बालि के सन्दर्भ में व्यंग्य करते हुए लिखा, जब वह सुग्रीव की गर्जना सुन उसको मारने चला तो गोस्वामीजी यह नहीं लिखते हैं कि ज्ञानी बालि या भावुक बालि चला, अपितु वे लिखते हैं कि अभिमानी बालि चला । उसके व्यवहार से पता चल गया कि उसे कितना अभिमान है । अभिप्राय है कि हमारे ज्ञान और भावना की कसौटी तो हमारा व्यवहार है । यदि बालि की समझ में आ गया है कि श्रीराम साक्षात ईश्वर हैं, तब तो उसे यही अनुभव करना चाहिए कि भगवान की कृपा मेरे ऊपर है, तो सुग्रीव के ऊपर भी है । बालि के जीवन में ज्ञान सुग्रीव से अधिक है, ईश्वर के प्रति भावना भी अधिक है, मगर उसके जीवन में जो परिणाम निकलना चाहिए था, वह नहीं निकल रहा है । सुग्रीव पर प्रहार करके, उसे हराकर वह बड़ी प्रसन्नता का बोध कर रहा है ।

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