Wednesday, 24 January 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ....

जिन्हें हम सद्गुण कहते हैं, जैसे निर्भयता, यदि यह निर्भयता देवता की वृत्ति में उदित हो, तो वह समाज के लिए बड़ा हितकर होगा, परन्तु देववृत्ति वाले निर्भय हों या न हों, पर दैत्यवृत्ति वाले तो प्रारंभ से ही निर्भय दिखाई देते हैं । इसलिए बड़ी विचित्र स्थिति पैदा हो जाती है । कहीं किसी गाँव में डाका पड़ता है, तो दस-बीस डाकू आकर अपनी निर्भयता के कारण पूरे गाँव को लूटकर ले जाते हैं; परन्तु गांववाले बेचारे भले आदमी हैं, उनमें डाकुओं जितनी निर्भयता की वृत्ति नहीं है, इसलिए लूट लिए जाते हैं । अतः समस्या यह है कि गुण कहीं किसी ऐसे व्यक्ति को प्राप्त न हो जाए, जो उसका दुरुपयोग करे ।

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