जिन्हें हम सद्गुण कहते हैं, जैसे निर्भयता, यदि यह निर्भयता देवता की वृत्ति में उदित हो, तो वह समाज के लिए बड़ा हितकर होगा, परन्तु देववृत्ति वाले निर्भय हों या न हों, पर दैत्यवृत्ति वाले तो प्रारंभ से ही निर्भय दिखाई देते हैं । इसलिए बड़ी विचित्र स्थिति पैदा हो जाती है । कहीं किसी गाँव में डाका पड़ता है, तो दस-बीस डाकू आकर अपनी निर्भयता के कारण पूरे गाँव को लूटकर ले जाते हैं; परन्तु गांववाले बेचारे भले आदमी हैं, उनमें डाकुओं जितनी निर्भयता की वृत्ति नहीं है, इसलिए लूट लिए जाते हैं । अतः समस्या यह है कि गुण कहीं किसी ऐसे व्यक्ति को प्राप्त न हो जाए, जो उसका दुरुपयोग करे ।
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