Friday, 12 January 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

सुग्रीव को राज्य मिला, पत्नी मिली, यह सब मिठाई थी, पर भोगों में पड़कर जब वे रोगग्रस्त हो गए, तो भगवान ने लक्ष्मणजी को भेजा कि अब तो दवाई देनी पड़ेगी और भगवान को उस समय बालि की ही याद आ गयी । उन्होंने कहा, जिस बाण से मैंने बालि को मारा, उसी से कल मैं सुग्रीव को भी मारूँगा । लक्ष्मणजी बोले, यह कार्य आप मुझे सौंप दें, मैं अभी जाकर उसे मार देता हूँ । प्रभु ने कहा, क्या तुम सोचते हो कि मैं सचमुच उसे मारने की योजना बना रहा हूँ ? लक्ष्मणजी बोले कि प्रभो ! अभी तो आप यही कह रहे थे । भगवान बोले, मैं इसलिए कह रहा था कि यह सुनकर डर के मारे शायद वह रास्ते पर आ जाए । सुग्रीव को मिठाई तो बहुत मिल गई, अब इस बाण की कड़वी दवा से उसके ह्रदय में, उसके जीवन में परिवर्तन हो, इसलिए मैंने ऐसा कहा । लक्ष्मणजी ने पूछा, प्रभो ! अब करना क्या है ? भगवान बोले कि भय के कारण ही तो सुग्रीव भक्त बना था । बालि को मिटा दिया तो उसका भय दूर हो गया और इसका परिणाम यह हुआ कि अब मुझे ही भूल गया, उसका स्वभाव अब भी वैसा ही है । जाओ, थोड़ा-सा डर उसमें फिर पैदा कर दो, वह फिर भक्त बन जाएगा । लक्ष्मणजी प्रसन्न होकर चलने लगे, तो सुग्रीव के डरपोक और भगोड़े स्वभाव को ध्यान में रखकर भगवान बोले, लक्ष्मण ! जरा ध्यान रहे, वह जितना डरपोक है, उतना भगोड़ा भी है । ऐसा न डराना कि वह दूसरी ओर भाग खड़ा हो, बल्कि ऐसा डराना कि इधर ही आए । इसी में डर का सदुपयोग है । भगवान कहते हैं - भय भय के लिए नहीं है, भय का उपयोग प्रेम के लिए है ।

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