....कल का शेष.....
जिसे हम बालि का दुर्बल पक्ष कहते हैं, वह उसके द्वारा तारा को कहे गए दो वाक्यों से प्रकट होता है । उनमें से एक विचारमूलक है और दूसरा भावनामूलक, लेकिन दोनों का जो निष्कर्ष निकला, वह सही नहीं था । ब्रह्म तो वस्तुतः सम है । श्रीराम ब्रह्म हैं, वे सम हैं । तुम चिन्ता मत करो कि वे सुग्रीव का पक्ष लेंगे और मेरा विरोध करेंगे । 'ईश्वर सम है' यहाँ तक उसका कहना बिल्कुल ठीक है, पर इसका यह निष्कर्ष निकालना ठीक नहीं है कि वे सुग्रीव का पक्ष नहीं लेंगे । उसके वाक्य में एक गुण है, तो एक दोष भी है । वह तारा से भावुकता के स्वर में दूसरी बात यह भी कहता है, यदि तुम्हें लगता है कि वे मुझे मार देंगे, तो भी तुम्हें चिन्तित होने की आवश्यकता नहीं, यदि ईश्वर मुझे मार भी देगा, तो मैं तो धन्य हो जाऊँगा । इस प्रकार एक तो ईश्वर सम है और यदि नहीं भी है तो उसके प्रहार में कृपा हो सकती है, इन दोनों बातों का ज्ञान बालि के जीवन में है । इस अर्थ में वह सुग्रीव की अपेक्षा ईश्वर से अधिक निकट है । पर कमी उसमें इस अर्थ में है ? ईश्वर सम है, इस ज्ञान का यदि हम यह अर्थ लें कि ईश्वर पाप और पुण्य में सम है, अतः मनमाने पाप करो, चिन्ता की कोई बात नहीं, तब तो ईश्वर का समत्व समाज के लिए बड़ा घातक सिद्ध होगा । इसी प्रकार भगवान के बाण के प्रहार में कृपा दिखे, तो इस सिद्धांत का यह अर्थ तो नहीं होता कि हम यही चेष्टा करें कि हम अनुचित कार्यों में लगें रहें और यह मानें कि भगवान हमें मारेंगे भी तो भी कृपा ही होगी । भगवान तो रावण पर भी कृपा करते हैं, तो क्या हमें रावण ही बनना चाहिए । कृपा की यह व्याख्या उचित नहीं है ।
जिसे हम बालि का दुर्बल पक्ष कहते हैं, वह उसके द्वारा तारा को कहे गए दो वाक्यों से प्रकट होता है । उनमें से एक विचारमूलक है और दूसरा भावनामूलक, लेकिन दोनों का जो निष्कर्ष निकला, वह सही नहीं था । ब्रह्म तो वस्तुतः सम है । श्रीराम ब्रह्म हैं, वे सम हैं । तुम चिन्ता मत करो कि वे सुग्रीव का पक्ष लेंगे और मेरा विरोध करेंगे । 'ईश्वर सम है' यहाँ तक उसका कहना बिल्कुल ठीक है, पर इसका यह निष्कर्ष निकालना ठीक नहीं है कि वे सुग्रीव का पक्ष नहीं लेंगे । उसके वाक्य में एक गुण है, तो एक दोष भी है । वह तारा से भावुकता के स्वर में दूसरी बात यह भी कहता है, यदि तुम्हें लगता है कि वे मुझे मार देंगे, तो भी तुम्हें चिन्तित होने की आवश्यकता नहीं, यदि ईश्वर मुझे मार भी देगा, तो मैं तो धन्य हो जाऊँगा । इस प्रकार एक तो ईश्वर सम है और यदि नहीं भी है तो उसके प्रहार में कृपा हो सकती है, इन दोनों बातों का ज्ञान बालि के जीवन में है । इस अर्थ में वह सुग्रीव की अपेक्षा ईश्वर से अधिक निकट है । पर कमी उसमें इस अर्थ में है ? ईश्वर सम है, इस ज्ञान का यदि हम यह अर्थ लें कि ईश्वर पाप और पुण्य में सम है, अतः मनमाने पाप करो, चिन्ता की कोई बात नहीं, तब तो ईश्वर का समत्व समाज के लिए बड़ा घातक सिद्ध होगा । इसी प्रकार भगवान के बाण के प्रहार में कृपा दिखे, तो इस सिद्धांत का यह अर्थ तो नहीं होता कि हम यही चेष्टा करें कि हम अनुचित कार्यों में लगें रहें और यह मानें कि भगवान हमें मारेंगे भी तो भी कृपा ही होगी । भगवान तो रावण पर भी कृपा करते हैं, तो क्या हमें रावण ही बनना चाहिए । कृपा की यह व्याख्या उचित नहीं है ।
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