विश्वास भी हो गया, प्रीति भी हो गई, तब सुग्रीव भगवान से बोले, महाराज ! मैं समझ गया कि आप बालि का वध कर देंगे । पर जीव का विश्वास कैसा होता है ? क्या इसके बाद सुग्रीव के जीवन में समस्याएँ नहीं आईं ? वे तो पग-पग पर आती हुई दिखाई देती हैं । गोस्वामीजी ने एक बहुत बढ़िया बात कही । उनसे पूछा गया कि आप रामायण कैसे लिख रहे हैं ? बोले कि भगवान की प्रेरणा से । पर उसके साथ उन्होंने एक विचित्र बात जोड़ दी । क्या ? मुझमें जितना बुद्धि-बल है, प्रभु की प्रेरणा से उतना ही लिखूँगा । इसका अर्थ क्या है ? जब भगवान की प्रेरणा से लिखना है, तो अपने बुद्धि-बल-विवेक की बात क्यों कहते हैं ? इसका उत्तर यह है कि जैसे किसी के पास दूध का अगाध सागर है और आप सुन लें कि वे बड़े उदार हैं, बड़ी उदारता से दूध बाँट रहे हैं, तो यह सुनकर आप दूध लेने जाएँगे, वे तो सचमुच बड़ी उदारता पूर्वक दूध बाँट रहे हैं, पर आप तो उतना ही दूध लेकर लौटेंगे जितना बड़ा आपका पात्र है । इसी प्रकार भगवान की महिमा के साथ-साथ जीव के विश्वास का बर्तन जितना बड़ा होगा, ईश्वर की महिमा उसमें उतनी ही समायेगी, वहाँ पर उतनी ही दिखेगी ।
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