Sunday, 21 January 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

साधारण परम्परा की दृष्टि से देखें, भगवान श्रीराघवेन्द्र द्वारा सुग्रीव को राज्य देना और अंगद को युवराज बनाना उपयुक्त नहीं लगता, क्योंकि प्राचीन परम्परा के अनुसार तो राज्य आनुवांशिक परम्परा से प्राप्त होता था । ऐसी परिस्थिति में जब कोई सिंहासन पर बैठता था, तो उसका पुत्र ही युवराज के पद पर अभिषिक्त किया जाता था । यहाँ पर भगवान उसे एक दूसरे ही रूप में प्रस्तुत करते हैं । वे राज्य पद तो सुग्रीव को देते हैं, पर राज्य की परम्परा को सुग्रीव के वंश से न जोड़कर बालि के पुत्र अंगद को युवराज बनाने की आज्ञा देते हैं । यदि आध्यात्मिक दृष्टि से विचार करें, तो भगवान का अभिप्राय यह है कि सुग्रीव सूर्य के पुत्र हैं । सूर्य प्रकाश है, विचार है, ज्ञान है और बालि इन्द्र का अंश है, वह पुण्य तथा सत्कर्म का प्रतीक है । बालि में अभिमान था, परन्तु अंगद ऐसे सत्कर्म और पुण्य का प्रतीक है, जिनमें अभिमान की वृत्ति नहीं है । इसका आध्यात्मिक तात्पर्य यह है कि ज्ञान और सत्कर्म एक-दूसरे के विरोधी नहीं, अपितु पूरक हैं । बहुधा समाज में एक बड़ा विचित्र विरोधाभास दिखाई देता है, जो व्यक्ति अधिक कर्तव्यपारायण होते हैं, वे प्रायः विचार को अनुपयोगी मानकर उससे भागते हैं और कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो बहुत विचार करते हैं, पर कर्म के प्रति उनकी हेय दृष्टि होती है या कर्म में उनकी वृत्ति नहीं होती ।

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