समुद्र मंथन के समय बाह्य दृष्टि से देखने पर लक्ष्मी के सन्दर्भ में भगवान बड़े स्वार्थी दिखाई दे रहे हैं, क्योंकि उन्होंने लक्ष्मी को स्वयं ले लिया, पर आप श्रीमद्भागवत पढ़िए, जब लक्ष्मीजी निकलीं तो सारे देवता उन्हीं की ओर देखने लगे । लक्ष्मीजी की सखियों ने कहा कि आप जिन्हें चाहें, वरमाला पहनाकर उनका वरण करें । लक्ष्मीजी ने देखा कि प्रत्येक देवता में कुछ गुण हैं तो कुछ दोष भी हैं, पर जब उन्होंने भगवान नारायण को देखा कि वे तो सर्वगुणसंपन्न हैं । उनमें कोई दोष है ही नहीं । सखियों ने पूछा कि क्या इनमें भी कोई दोष है ? लक्ष्मीजी बोलीं, नहीं, पर इनके प्रति मेरे मन में एक उलाहना अवश्य है । क्या ? बोलीं, सारे देवता मेरी ओर देख रहे हैं, मुझे पाने को लालायित हैं, पर ये ही अकेले ऐसे हैं, जिनकी दृष्टि मेरी ओर नहीं है । मैं तो सोचती हूँ कि इन्ही के गले में वरमाला डाल दूँ । बड़ी सांकेतिक भाषा है । यहाँ अभिप्राय यह है कि जो लक्ष्मीजी को चाहने वाले हैं, उन्हें यदि वे मिलेंगी, तब तो वे उसे संचित करके रखने की ही चेष्टा करेंगे, पर जिनके जीवन में लक्ष्मी के प्रति आसक्ति नहीं है, उन्हें जब वे मिलेंगी, तो उससे लोक-कल्याण होगा ।
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