Saturday, 27 January 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ....

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....
वस्तुतः भगवान द्वारा अमृत-वितरण करते समय जो पक्षपात दिखाई देता है, वह केवल बहिरंग दृष्टि से दिखाई देनेवाली विषमता है । समान रूप से वितरण कर दिया जाए, यह सूत्र तो बड़ा आकर्षक प्रतीत होता है, परन्तु बिना परिणाम का विचार किये, यदि समान वितरण किया जाए तो वह समान वितरण कल्याणकारी नहीं होगा । अतः भगवान विष्णु के वितरण में जो पक्षपात दिखाई देता है, वह केवल स्थूल दृष्टि से दिखाई देता है, अन्तरंग दृष्टि से नहीं । उसमें संकेत क्या था ? भगवान नारदजी पर हँसते हुए बोले, नारद, तुम कहते हो कि मैंने शंकरजी को जहर पिला दिया, लेकिन जिनको मैंने जहर पिलाया, उन्होंने तो मुझे कभी उलाहना नहीं दी और तुम उनका पक्ष लेकर उलाहना दे रहे हो । विचार करके देखो, असुरों का और समाज का भी कल्याण तो उनकी मृत्यु में ही है । इसलिए असुरों को अमृत नहीं मिलना चाहिए और शंकरजी को विष मिला लेकिन विष को विष तब कहते हैं, जब वह व्यक्ति को मार दे, पर इस विषपान के द्वारा तो शंकरजी की महिमा और भी प्रकट हो गई कि संसार के अन्य देवता तो अमृत पीकर अमर हुए मगर शंकरजी ने तो विष को भी अमृत बना लिया, वे तो विष पीकर अमर हो गए ।

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