भगवान विष्णु के साथ कौस्तुभमणि की भी कथा जुड़ी हुई है । उसका रहस्य भी समझ लेने योग्य है । अन्य किसी मणि को धागे में पिरोने के बाद ही उसे धारण किया जाता है । और यह कौस्तुभमणि, जिसे भगवान अपने गले में धारण किए हुए हैं, वह किस धागे में पिरोई हुई है, सोने के धागे में कि चाँदी के धागे में कि सूत के धागे में ? पुराणों में उसका बड़ा अनोखा वर्णन किया गया है । वहाँ संकेत यह है कि कौस्तुभमणि बिना किसी धागे के, बिना किसी सूत्र के, भगवान के गले में लग जाती है । यह बड़ा सार्थक संकेत है । जब हम किसी मणि को धागे में पिरोकर धारण करते हैं, तो उसमें छिद्र करना पड़ता है, पर कौस्तुभमणि निश्छिद्र है और बिना किसी प्रयत्न के इसका भगवान के ह्रदय की ओर आकर्षण है ।
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