अयोध्या में कैकेयीजी हैं, जिन्हें भरतजी के रूप में एक ऐसा वैद्य प्राप्त हुआ जिसके अन्तःकरण में लोभ का कहीं लेश नहीं था। परिणाम यह होता है कि वे पूरी तरह स्वस्थ हो उठती है। वैसे कैकेयीजी ने वैद्य को भी अस्वस्थ बनाने की चेष्टा की थी, क्योंकि अयोध्या का राज्य उन्होंने भरतजी के लिए ही माँगा था। यह तो वैसा ही था, जैसे कोई रोगी वैद्य को ही कुपथ्य दे, रोगी बनाने की चेष्टा करे, पर सजग वैद्य रोगी के प्रलोभन में नहीं आता है, क्योंकि वह जानता है कि रोगी को मेरी बात माननी चाहिए, रोगी की बात मैं मानूँ यह ठीक नहीं। परिणाम यह होता है कि कैकेयीजी अन्ततोगत्वा भरतजी के साथ चित्रकूट जाती हैं। उनके अन्तःकरण में बड़ी ग्लानि उत्पन्न होती है। उन्हें यह भान हो जाता है कि उनसे बहुत बड़ी भूल हो गयी, बहुत बड़ा अनर्थ हो गया। फिर श्रीभरत के चरित्र के माध्यम से अपनी उस त्रुटि का परिमार्जन करके वे स्वस्थ हो जाती हैं। किन्तु प्रतापभानु अयोग्य ठग वैद्य को पाकर अस्वस्थ हो जाता है।
Monday, 31 August 2015
Sunday, 30 August 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............
ठग-वैद्य रोगी की दुर्बलता का अनुचित लाभ उठाते हैं, वे उसे स्वस्थ करने की चिन्ता नहीं करते, बल्कि उसे अस्वस्थ बनाये रखकर उससे पैसा ऐंठने की तिकड़म करते रहते हैं। प्रतापभानु ने मानसिक लोभ से ग्रस्त ऐसे ही महालोभी और तिकड़मी कपटमुनि को वैद्य के रूप में चुना। गोस्वामीजी कहते हैं कि कपटमुनि था तो बड़ा चमत्कारी। प्रतापभानु रात्रि के समय जब उससे पूछता है कि मैं अपने घर कैसे पहुँचूँ ? तो वह कहता है - तुम्हारा घर यहाँ से सत्तर योजन दूर है, वन है अनंत अँधेरा मार्ग है, कैसे पहुँच पाओगे ? सो जाओ। मैं तुम्हें सोते -सोते पहुँचा दूँगा। गोस्वामीजी संकेत देते हैं कि ऐसे चमत्कारों से एकदम श्रद्धालु नहीं बन जाना चाहिए, सावधानी भी रखनी चाहिए। अभिप्राय है कि अपने आप में चमत्कार महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण यह है कि चमत्कार हमें पहुँचाता कहाँ है ? कपटमुनि जो कहता है कि तुम आश्रम में सो जाओ, तुम्हारे सोते-सोते हम तुम्हें पहुँचा देंगे, इसका अभिप्राय क्या है ? यही कि हमें कुछ करना न पड़े और हमारे बिना कुछ किये हम जो चाहें प्राप्त हो जाय। लोभी की , कामी की और साधारतया प्रत्येक व्यक्ति की यही प्रवृत्ति होती है कि वह सफलता का छोटा मार्ग ढ़ूँढ़ता है।
Saturday, 29 August 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...........
यदि मनुष्य के मन में लोभ की ऐसी वृत्ति आवे कि हमें लाभ हो, तो उसे अस्वाभाविक नहीं कहा जा सकता, क्योंकि यह व्यक्ति के स्वभाव में है कि वह जब कोई कार्य करता है, तो उसमें लाभ चाहता है- नौकरी में लाभ, व्यापार में लाभ। अतएव यह नहीं कहा जा सकता कि लाभ की वृत्ति समाज से पूरी तरह मिट जाय या मिट जानी चाहिए। लोभ में में यदि एक ही इच्छा आवे तब वह समाज के लिए प्रायः घातक नहीं होती है, लेकिन जब लोभ की वृत्ति के रूप में मंथरा जीवन में आती है तब वह ऐसी प्रेरणा करती है कि व्यक्ति कभी भी एक वरदान नहीं माँगता, वह हमेशा दो वरदान माँगता है, कहता है कि मुझे लाभ हो और बगल वाले को घाटा जरूर हो। ऐसे लोभी को अपने लाभ का पूरा आनन्द तब मिलता है, जब दूसरे की हानि होती है। जब लोभ में ऐसी प्रवृत्ति आती है, तब वह रामराज्य में बाधक बन जाती है। कैकेयी और प्रतापभानु दोनों के जीवन में ऐसा विकृत लोभ दिखाई पड़ता है, पर अन्त में जाकर कैकेयी का रोग साध्य हो गया, जबकि प्रतापभानु का असाध्य। इस अन्तर का कारण यह था कि कैकेयी को श्री भरत के रूप में एक विलक्षण वैद्य मिले, जबकि प्रतापभानु को कपटमुनि के रूप में ठग-वैद्य मिला।
Friday, 28 August 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............
यह आपने सांकेतिक रूप में रामचरितमानस में पढ़ा होगा कि भगवान श्रीराम के चरित्रक्रम तीन यात्राएँ हैं और उनके सामने तीन नारी-पात्र आते हैं। जब उन्हें विश्वामित्र लेकर चले, तो ताड़का सामने आयी। जब वे वन को गये तो मंथरा इसमें हेतु बनी और उनके लंका पर आक्रमण करने में शू्र्पणखा कारण बनती है। ताड़का पर तो भगवान ने प्रहार किया, एक बाण से उसका वध कर दिया। मंथरा पर शत्रुध्न ने प्रहार किया और शू्र्पणखा पर लक्ष्मणजी ने। ये तीनों नारी-पात्र त्रेतायुग में इतिहास के पात्र के रूप में आते हैं। वस्तुतः व्यक्ति के अन्तःकरण में रहने वाली क्रोध, लोभ और काम की तीन वृत्तियाँ हैं - क्रोधमयी ताड़का, लोभमयी मंथरा और कामवासना से भरी हुई शू्र्पणखा। रामराज्य की स्थापना के लिए इन तीनों पर विजय की आवश्यकता है। चारों भाइयों में से तीनों भाइयों ने इन तीनों पर प्रहार करने का उत्तरदायित्व ग्रहण किया, पर बचे हुए श्री भरत की इसमें कोई भूमिका नहीं दिखाई दे रही है, वे किसी प्रकार का प्रहार करते हुए नहीं दिखाई दे रहे हैं। तो क्या उनकी भूमिका ही नहीं है ? नहीं ! ऐसी बात नहीं, उनकी बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका है और वह है चिकित्सक की भूमिका। जहाँ अन्य तीनों भाई प्रहार की भूमिका का निर्वाह करते दिखाई देते हैं, वहाँ श्री भरत चिकित्सक के रूप में तीनों वृत्तियों की चिकित्सा करते हुए दिखाई देते हैं।
Thursday, 27 August 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............
गोस्वामीजी लिखते हैं कि मन के ये जो पापी रोग हैं, दुर्गुण हैं, इनकी विलक्षणता यह है कि जानने से वे क्षीण हो जाते हैं, पर हाँ ! वे पूरी तरह से नाश को नहीं प्राप्त होते हैं। जैसे शारीरिक रोग के संदर्भ में यदि व्यक्ति को ज्ञात न हो कि वह अस्वस्थ है, तो परिणाम यह होता है कि भीतर ही भीतर उसका रोग बढ़ता रहता है। किन्तु यदि उसे मालूम हो जाता है कि उसके शरीर में किसी प्रकार का रोग हुआ है, तो वह भोजन में, व्यवहार में सतत सावधान रहता है और वैद्य डाँ. आदि की खोज में लगा रहता है। शारीरिक रोगों के संदर्भ का यह सत्य मानसिक रोगों के संदर्भ में और भी अधिक सत्य है। मानस-रोगों का जो संस्कार है, उनका जो मूल उद्भव है, वह मात्र इस जन्म का नहीं है, अपितु पूर्वजन्मों से चित्त के संस्कार के साथ जुड़ा हुआ है। गोस्वामीजी विनयपत्रिका में कहते हैं - जनम जनम अभ्यास निरत चित, अधिक अधिक लपटाई। - अनेक जन्मों से यह मन पाप में लगे रहने का अभ्यासी हो रहा है, इसलिए यह पाप रूपी मल अधिकाधिक लिपटता ही चला जाता है।
Wednesday, 26 August 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............
रामचरितमानस में रामकथा के समापन के बाद गरूड़जी ने काकभुशुण्डिजी से कहा - कृपया आप मेरे सात प्रश्नों का समाधान दें। ये सातों प्रश्न हम सबके जीवन से जुड़े हुए हैं। जो समस्याएँ हमारे सामने आती हैं, इन सातों प्रश्नों में उनका अन्तर्भाव है। उनमें अंतिम प्रश्न यह था कि लोग इतने दुखी क्यों हैं ? अशांत क्यों हैं ? इसके उत्तर में काकभुशुण्डिजी ने कहा कि व्यक्ति की अस्वस्थता ही उसे दुखी और अशांत बना देती है और वह अस्वस्थता दो प्रकार की होती है - शारीरिक और मानसिक। अब कुछ मनुष्य शारीरिक दृष्टि से स्वस्थ हो सकते हैं, पर ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं होगा, जो मानसिक दृष्टि से अस्वस्थ न हो। यहाँ तक कि क्षीरसागर में भगवान के सान्निध्य में रहने वाले गरूड़जी भी स्वयं अस्वस्थ हो जाते हैं, जिसकी चिकित्सा के लिए उन्हें चारों ओर वैद्य की खोज करनी पड़ती है। तो, वे भुसुण्डिजी से यह जानना चाहते हैं कि व्यक्ति या समाज के जीवन में ये मनोरोग कैसे पैदा होते हैं ? इनका स्वरूप क्या है तथा इन रोगों को मिटाने की कोई अमोघ दवा है अथवा नहीं ? इस पर काकभुशुण्डिजी ने वैद्य, औषधि और पथ्य आदि की व्यवस्था तो बतलायी, पर साथ ही यह भी कहा कि जो सबसे प्रारंभिक बात है वह यह है कि व्यक्ति को रोग का सही-सही ज्ञान हो जाय। तब गरूड़जी ने पूछा- क्या रोगों का ज्ञान हो जाने मात्र से व्यक्ति रोग से मुक्त हो सकता है ? भुसुण्डिजी बोले - नहीं, उससे रोग पूरी तरह से तो मुक्त नहीं हो सकता, पर इसमें कोई संदेह नहीं कि जब व्यक्ति अपने रोग को जान लेता है, तब उसके रोग की शक्ति, उसकी क्षमता कम हो जाती है।
Tuesday, 25 August 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............
लोभ के लिए गोस्वामीजी ने जो अपारा विशेषण लगाया, उसका एक विशिष्ट तात्पर्य है। काम और क्रोध इन दोनों दुर्गुणों का संबंध क्रमशः वर्तमान और भूतकाल से होता है। काम का स्वभाव है वर्तमानवादी होना। वर्तमान में कोई आकर्षण हुआ और अन्तःकरण में काम का संचार हो गया, पर क्रोध कब आता है ? कोई बात हो गयी तो क्रोध आता है कि ऐसा क्यों हुआ ? अतएव क्रोध भूतवादी है, पर यह जो लोभ है, वह भविष्यवादी है। इतना लोभ किसके लिए? बुढ़ापे के लिए। फिर बुढ़ापा नहीं, लड़के के लिए। लड़का ही नहीं पीढ़ी-दर-पीढ़ी के लिए। अब वर्तमान और भूत तो ससीम हैं, पर भविष्य की कोई सीमा बाँधना कठिन है। इसलिए लोभ को अपार कहा।
Monday, 24 August 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............
रामायण में विश्वास के दो पक्ष दिखाये गये है। एक पक्ष में कहा गया है कि ईश्वर में एवं संत में विश्वास होना परम कल्याणकारी है, पर उसके साथ ही दूसरे पक्ष के रूप में ऐसे भी पात्र बताये गये हैं, जहाँ विश्वास बड़ा घातक सिद्ध हुआ। केवल विश्वास होना अपने आप में गुणकारी नहीं है। इसका कोई अर्थ नहीं है कि चाहे जहाँ विश्वास कर लिया। रावण पर सीताजी ने विश्वास किया। प्रतापभानु ने कपटमुनि पर विश्वास किया। तो इन लोगों का विश्वास साधक सिद्ध हुआ कि घातक ? तात्पर्य यह है कि जहाँ पर हम बिना विचार के अपना विश्वास स्थापित कर देते हैं, वहाँ हमारे लिए विश्वास घातक सिद्ध होता है।
Sunday, 23 August 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............
रामायण में दो मृगों का एक सांकेतिक प्रसंग आया है। रावण सीताजी को ठगने के लिए सुनहरा मृग ले आया था और वह स्वयं चाँदी के दाँतों वाले मृग से ठगा गया, क्योंकि आखिर प्रतापभानु ही तो रावण बना न ! यह बुराई का मनोविज्ञान है। व्यक्ति एक बार जब किसी से ठगा जाता है तो दूसरे को ठगने के लिए उसी कला का प्रयोग करता है। कहीं किसी को नोट भुनाने में नकली नोट मिल गयी। अब होना तो यह चाहिए था कि जब व्यक्ति को मालूम पड़ गया कि नोट नकली है, तो वह उसे फेंक देता, पर ऐसा होता नहीं। मनुष्य में स्वार्थवृत्ति आ जाती है और वह सोचता है कि मैंने जब धोखा खाया, तो मैं क्यों घाटे में रहूँ और वह उस नकली नोट को चलाने की ताक में रहता है। किसी के द्वारा हम ठगे जाते हैं तो हम दूसरे तो ठगते हैं और वह तीसरे को ठगता है। इस प्रकार से बुराई का चक्र प्रारंभ होता है। लेकिन इस लोभ-मृग के प्रति आकर्षण कभी खत्म नहीं होता।
Saturday, 22 August 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...........
अलग-अलग विकारों के केन्द्र अलग-अलग हैं। काम को नारी-सौन्दर्य का बल है और क्रोध को कठोर वाणी का। लोभ के लिए बल का केन्द्र है - इच्छा और दम्भ। प्रतापभानु के जीवन में सबसे पहले राज्य की इच्छा हुई। इसका अर्थ यह है कि पिता की राज्यसत्ता में बने रहते हुए भी मैं राजा बनूँ ऐसी इच्छा प्रतापभानु के मन में विद्यमान थी और ज्यों ही पिता ने कहा कि तुम इस राज्य का संचालन करो, उसने अपनी इच्छा की पूर्ति का अवसर प्राप्त कर उसे स्वीकार कर लिया। अपनी इच्छा को यह कहकर उसने अपनी बुद्धि का समर्थन दे दिया कि मैं पिताजी के आदेश से राज्य ले रहा हूँ, वस्तुतः मुझमें राज्य लेने की कोई इच्छा नहीं है। गोस्वामीजी कहते हैं कि राजा होने के बाद वह चतुरंगिणी सेना सजाता है तथा राजाओं के राज्य पर आक्रमण करता है। यही इच्छा का विस्तार है। उसे लगता है कि मेरी योग्यता तो इस राज्य को बढ़ाने में है और बढ़ाने का उपाय यह है कि अपने भाग पर तो अधिकार कर ही लें, दूसरे के भाग को भी छीनने की चेष्टा करें और यह केवल प्रतापभानु का ही मनोभाव नहीं है, यह लिप्सा की प्रवृत्ति हम सबमें रुढ़ है। हम समझते हैं कि जब तक दूसरों की समृद्धि के भाग को छीनकर हम उसके स्वामी नहीं बन जाते, तब तक हमारी योग्यता कुछ दिखती नहीं।
Friday, 21 August 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............
रामचरितमानस में यह संकेत दिया गया है कि भोग और त्याग दोनों धर्म के रूप में व्यक्ति के सामने आते हैं। यदि भोग को व्यक्ति बाध्यता समझकर अपने मन की दुर्बलता समझकर भोगता है, तो वह बच जायेगा, पर यदि वह भोग को बौद्धिक समर्थन देता हुआ भोगता है, तो उसमें लिप्त हो जायेगा और डूब मरेगा। यह विश्लेषण केवल इतना संकेत देने के लिए था कि मनु के पुत्र ने पिता की आज्ञा होते हुए भी राज्य को स्वीकार करने में हिचकिचाहट दिखलायी और उनमें राज्यलिप्सा का अभाव था, इसलिए उसने बाध्यता में राज्यसत्ता स्वीकार की, परन्तु प्रतापभानु में अधिकार - लिप्सा थी, लोभ था, इसलिए उसने राज्यसत्ता स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं की, उलटे उसे अपना प्राप्तव्य मानकर स्वीकार किया। प्रतापभानु का यह लोभरूप कफ ही उसके विनाश का कारण होता है और उसे अंत में रावण बना देता है।
Thursday, 20 August 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............
जीवन में कभी ऐसे विचित्र अवसर आते हैं, जब धर्म का स्वरूप समझना कठिन हो जाता है। एक उदाहरण कर्ण का है। जब वह युद्ध कर रहा था, उस समय उसके रथ का पहिया जमीन में धँस गया। जब वह रथ से उतरकर पहिया निकालने लगा, तब भगवान कृष्ण ने अर्जुन से कहा - बस इसी समय इसे मारो। नहीं तो यह नहीं मरेगा। अर्जुन थोड़ा हिचकिचाता है कि जब कोई व्यक्ति निहत्था होकर अपने रथ का पहिया निकाल रहा हो, तब क्षात्रधर्म के अनुसार उस पर प्रहार कैसे किया जाय ? कर्ण को देखें तो वह धर्म के रथ पर आरूढ़ है। धर्मरथ में जितने गुण बतलाये गये हैं, उनमें से अधिकांश कर्ण के जीवन में दिखाई देते हैं। पर कर्ण का दुर्भाग्य यह है कि ऐसे धर्मरथ पर बैठकर भी वह अधर्म को जिताने के लिए युद्ध कर रहा है। भगवान कृष्ण का तात्पर्य यह है कि जिस समय कर्ण धर्मरथ से उतरा हुआ है, उसी समय उस पर प्रहार करना चाहिए, वही उसे मारने का उचित अवसर है। यदि तुम उसे इस प्रकार धर्म के द्वारा अधर्म को शक्ति प्रदान करने दोगे, तब तो तुम अधर्म को मार ही नहीं पाओगे। इसलिए अभी, इसी समय तुम कर्ण को मारे।
Wednesday, 19 August 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...........
मेघनाद मूर्तिमान काम है। जब वह युद्ध करता है, तो तीन प्रकार की कला का उपयोग करता है। मेघनाद की पहली युद्धकला का तात्पर्य है इन्द्रियों में काम आना। उसकी दूसरी युद्धकला का अर्थ है कि इन्द्रियों के साथ-साथ मन में काम का घुस जाना, फलतः काम के साथ राग और द्वेष का युक्त हो जाना। यह पहले की अपेक्षा और भी कठिन स्थिति है। उसकी तीसरी युद्धकला है कि निकुम्भिला में यज्ञ करने चले जाना। यह मानो काम का बुद्धि में प्रविष्ट होना है। उसका अर्थ है काम की बौद्धिक स्वीकृति। इससे काम अजेय हो जाता है। काम को जीतने के लिए कम से कम बुद्धि से तो हमें यह लगना चाहिए कि राग-द्वेष अच्छी वस्तु नहीं है, इन्द्रियों में काम का होना बुरा है। यदि हम इन्द्रियों और मन में विकार के होते हुए भी बुद्धि के द्वारा उसका विरोध करेंगे, बुद्धि से उसे बुरा मानेंगे, तो इसमें कोई संदेह नहीं कि भले समय लगे, पर बुराई को हम जीत सकते हैं, काम को पराजित कर सकते हैं। किन्तु जब हम बुद्धि और तर्क के द्वारा काम का समर्थन करने लगते हैं और कहते हैं कि नहीं, काम तो जीवन के लिए सबसे उपयोगी वस्तु है, तब काम अजेय हो जाता है।
Tuesday, 18 August 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............
दोषों के संबंध में गोस्वामीजी से पूछा गया कि व्यक्ति चेष्टा करके भी इन दोषों को क्यों दूर नहीं कर पाता है ? इसका उत्तर देते हुए वे विनय पत्रिका में कहते हैं कि मनुष्य के मन में जो दोष हैं, उनसे संबंध इसी जन्म से न होकर पूर्व-पूर्व जन्मों से है। वे लिखते हैं - अनेक जन्मों से यह चित्त पाप में लगे रहने का अभ्यासी है, इसलिए उसमें दोष अधिकाधिक लिपटते ही जाते हैं ? यह चित्त क्या है ? वह अन्तःकरण चतुष्टय का एक अंग है और उसके शेष तीन अंग हैं मन, बुद्धि और अहंकार। चित्त संस्कारों का पुंज है और उसमें दोष और गुण की सत्ता समान रूप से विद्यमान है। चित्त के ये दोष मन के धरातल पर सक्रिय होकर प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देते हैं। इस प्रकार चित्त और मन दोनों दोषयुक्त हो जाते हैं। चित्त से दोष का उद्भव होता है और मन से वह जीवन में क्रियान्वित होने लगता है। अब यदि उस दोष में मनुष्य की बुद्धि गुण देखने लगे तो फलस्वरूप वह व्यक्ति अहंकारी हुए बिना नहीं रहेगा। सामान्यतः मनुष्य का जीवन दो भागों में बँटा होता है - एक भाग में चित्त और मन और दूसरे भाग में बुद्धि और अहं, पर जब बुद्धि और अहं चित्त और मन के रंग में रंग जाते हैं, तब हमारा समूचा अन्तःकरण चतुष्टय दोषयुक्त हो जाता है। फलतः रोग असाध्य हो जाता है।
Monday, 17 August 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.........
रामचरितमानस में मन के दोषों का वर्णन करते हुए बतलाया गया कि भले ही हमारे मन में दोष विद्यमान है, पर यदि बुद्धि में यह बोध बना रहे कि मेरे मन में दोष है, यदि हम दोष को दोष के रूप में देखते रहें और बुद्धि के द्वारा उनका समर्थन न करें, तो इन दोषों को दूर किया जा सकता है।
Sunday, 16 August 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...............
जय और विजय जब रावण और कुम्भकर्ण के रूप में जन्म लेते हैं, तब उसके मूल में अहंकार की प्रधानता है। पर जब प्रतापभानु रावण बनता है, तब उसके मूल में लोभ की मुख्यता है। इसके सांकेतिक तात्पर्य यह है कि गोस्वामीजी मानो व्यक्ति की सावधान कर देना चाहते हैं कि वह यह सोचकर निश्चिन्त न हो जाय कि रावण एक बुरा व्यक्ति था, बल्कि यह जान ले कि रावणत्व किन परिस्थितियों में जन्म लेता है और यदि उसी प्रकार की मनःस्थिति और परिस्थिति हमारे जीवन में आती है, तो हम भी रावण बन सकते हैं। इसी प्रकार रुद्रगणों की गाथा के माध्यम से यह बतलाया गया है कि परदोष-दर्शन से भी रावणत्व का जन्म होता है तथा वृन्दा की गाथा यह प्रदर्शित करती है कि जब व्यक्ति धर्म से प्राप्त शक्ति को अधर्म के संरक्षण में लगाता है, तो उससे भी रावणत्व पैदा होता है। वृन्दा पतिव्रता थी और उसने अपने पतिव्रत से प्राप्त शक्ति के द्वारा अपने दुराचारी पति की रक्षा करनी चाही। वह तो हुआ नहीं, पर उसके पति जालन्धर को रावण के रूप में जन्म लेना पड़ा। इस प्रकार से यह चारों कल्पों की गाथा है।
Saturday, 15 August 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............
लोभ की अनिवार्यता, तत्पश्चात उसका अतिरेक और अतिरेक से उत्पन्न होने वाले परिणाम का पहला चित्र प्राप्त होता है रामचरितमानस के प्रारंभ में। मानस को पढ़ने पर कुछ ऐसा लग सकता है कि उसमें इतिहास-पक्ष की अवहेलना सी है। यदि कोई उसमें रावण के माता-पिता का नाम जानना चाहे, तो उसे निराश होना पड़ेगा। इतिहास के स्थान पर एक दूसरी पध्दति को इस ग्रंथ का आधार बनाया गया है, जिसका सम्बन्ध आध्यात्म से है। इस दूसरी पध्दति में यह नहीं कहते कि विश्रवा मुनि और कैकसी के द्वारा रावण का जन्म हुआ, बल्कि यह बतलाते हैं कि रावणत्व का जन्म कैसे होता है ? महत्व इसका नहीं है कि रावण इस जन्म में किसका बेटा था ? महत्व इसका है कि रावण पूर्वजन्म में क्या था ? रावण की पूर्वजन्म की जो गाथाएँ हैं, उनमें यह बतलाया गया है कि रावण पूर्वजन्म में बुरा नहीं था, पर अगले जन्म में वह बुरा हो जाता है। एक अच्छा व्यक्ति किन परिस्थितियों में बुरा बन जाता है, इसका एक क्रमिक विश्लेषण रावण के पुनर्जन्म की गाथा के माध्यम से रामचरितमानस में प्रस्तुत किया गया है। रामायण में रावण के चार रूपों की भी चर्चा की गयी है, जिसे चार-कल्पों की कथा के नाम जाना जाता है। एक कल्प में भगवान शंकर के गण अन्त में रावण और कुम्भकर्ण बन जाते हैं। दूसरे कल्प में भगवान विष्णु के पार्षद जय और विजय रावण और कुम्भकर्ण के रूप में परिणत हो जाते हैं। तीसरे कल्प की गाथा यह है कि प्रतापभानु नाम का राजा रावण के रूप में जन्म लेता है। इन पात्रों में से एक जब रावण के रूप में जन्म लेता है, तो उसके मूल में लोभ की वृत्ति है। यदि लोभ अतिशय न होता, उसकी पराकाष्ठा न होती, तो एक श्रेष्ठ व्यक्ति रावण के रूप में परिणत न हुआ होता।
Friday, 14 August 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............
काम के पश्चात गोस्वामीजी मन के दूसरे दोष को लेते हैं। वे कहते हैं कि व्यक्ति के मन का लोभ ही कफ है। जैसे व्यक्ति के शरीर में कफ की अवस्थिति अनिवार्य है, वैसे ही उसके तथा समाज के जीवन में भी लोभ की अनिवार्यता है। व्यक्ति जब कोई कार्य करता है, तो प्रारंभ में परिणाम की आकांक्षा उसके मन में होती ही है, लेकिन ध्यान रहे कि वह अपार न होने पाये। जिस समय कफ शरीर में सहज स्वभाव से स्थित रहता है, उस समय वह हानिकारक नहीं होता, अपितु शरीर की शक्ति की वृद्धि में सहायक ही होता है, लेकिन वही कफ बढ़ता हुआ यदि श्वास नली को जकड़ ले, ह्रदय को जकड़ ले, तब तो ऐसे स्थिति में वह कफ व्यक्ति को शक्ति देने के बदले उसके लिए मृत्यु का संदेश लेकर आता है। तब व्यक्ति को ऐसा लगता है कि जब तक हमारे ह्रदय में छाया हुआ कफ किसी तरह से बाहर नहीं निकलेगा, तब तक वह विनष्ट नहीं होगा, तब तक हमें शांति नहीं मिलेगी। लोभ की प्रवृत्ति का स्वरूप भी यही है। जब लोभ की प्रवृत्ति के साथ उसकी अपारता आ जाती है। तब वह घातक सिद्ध होता है।
Thursday, 13 August 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............
शंकरजी एक नया दर्शन प्रदान करते हैं, वह यह है कि काम को तो भस्म कर दिया जाए, पर कामशून्य रति बनी रहे। रति भले ही अपने को अनाथ अनुभव करे, वह भले ही कहे कि महाराज! मेरे पति को आपने जला दिया और मुझे छोड़ दिया, आपने मेरे पति को जलाया, तो क्या उससे सारे लोक ही नहीं जल जायेंगे ? यदि सृष्टि में काम नहीं रहेगा तो लोक भला फिर कैसे रहेगा ? इस पर भगवान शंकर रति को सांत्वना देते हुए बोले- रति! अब तुम्हारा काम अशरीरी होगा और बाद में जब भगवान का अवतार श्रीकृष्ण के रूप में होगा, तब तुम्हारा पति उनके पुत्र के रूप में उत्पन्न होगा। तात्पर्य यह कि काम जब राम की सेवा में, भगवान की सेवा में स्वयं को समर्पित कर दे और रति उनकी पुत्रवधू बनकर अपने को सौभाग्यशालिनी माने, तो यही जीवन की परिपूर्णता है।
Wednesday, 12 August 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............
भगवान शंकर ने काम को तो जलाया, पर आम को नहीं जलाया। इसका तात्पर्य क्या है ? आपने उत्तरकाण्ड में पढ़ा होगा कि काकभुशुण्डिजी सुमेरू पर्वत पर चार वृक्षों के नीचे अलग-अलग चार काम करते हैं। उसमें जब भगवान का सुंदरता और रूप का ध्यान करना होता है तो आम के वृक्ष के नीचे बैठ जाते। बड़ी सांकेतिक बात है। भगवान शंकर का तात्पर्य यह है कि आम रस का प्रतीक है और रस की अभिलाषा, रस की प्यास भला किस्में नहीं होती ? अब प्रश्न यह है कि समाज से काम को नष्ट करने के लिए क्या रस की प्यास, रस की अभिलाषा को ही मिटा दिया जाय ? शंकरजी मानो यह बताना चाहते हैं कि यह तो बस रस के सदुपयोग या दुरुपयोग का प्रश्न है। राम का ध्यान करने वाला आम के नीचे बैठा और शंकर पर आक्रमण करने वाला आम के ऊपर और जब आम के ऊपर, रस के ऊपर काम आरूढ़ हो जाए, तब शंकरजी के मत में, उस काम को जला ही देना चाहिए, पर सावधानी रखी जानी चाहिए कि रस की वृत्ति को समाप्त न किया जाए। साथ ही रति की वृत्ति को भी बचाकर रखने की चेष्टा करनी होगी। यह रति वृत्ति क्या है ? वह है मिलन की तीव्रतम उत्कण्ठा। यदि मिलन की तीव्रतम उत्कण्ठा ही सृष्टि से समाप्त हो जाए, तो साधक के मन में ईश्वर से मिलने की उत्कण्ठा कहाँ से आयेगी ? इसलिए भक्त लोग भगवान से प्रार्थना करते हैं कि प्रभु! काम को मिटा दीजिए, पर रति को बने रहने दीजिए।
Tuesday, 11 August 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............
शंकरजी के प्रसंग में भी जब काम उन पर आक्रमण करने के लिए आता है - वह तुरंत सुन्दर ऋतुराज बसन्त को प्रकट करता है, बसन्त में आम का वृक्ष व्यक्ति को बड़ा प्रिय लगता है। आम का फल भला किसे प्यारा नहीं लगता ? आम के बौर की सुगंध किसे आकृष्ट नहीं करती ? और उस आम के वृक्ष पर काम आ जाता है तथा वहीं से वह शंकरजी पर आक्रमण करता है। फलस्वरूप भगवान शंकर ने काम को तो जलाया, पर जिस आम के वृक्ष पर वह बैठा था, उसे नहीं जलाया अर्थात उन्होंने बसन्त को नहीं जलाया। सांकेतिक भाषा यह है कि उन्होंने काम को आधा जलाया और आधा छोड़ दिया अर्थात काम को तो जला दिया, पर उसकी पत्नी रति को छोड़ दिया। बस, वही काम का शुद्ध उपयोग है, जिसे भगवान शंकर अपनी प्रक्रिया से साधित करते हैं। नारी बसन्त ऋतु के समान है, बसन्त को नहीं मिटाना है, रति को नहीं मिटाना है। केवल काम को ही भस्म के रूप में परिणत करना है, जिससे उसके अमंगलकारी तत्व नष्ट हो जाएँ। नारी का एक रूप वह है, जहाँ वह बसन्त के रूप में काम की संगिनि हो वासना का संचार करती है, पर उसका एक दूसरा रूप भी है, जहाँ वह श्रद्धा के रूप में संत सभारूपी अमराई को विकसित करने हमारे जीवन में आती है। गोस्वामीजी लिखते हैं - संतों की सभा चारों ओर की अमराई है और श्रद्धा बसन्त ऋतु के समान कही गयी है। जब वासना का बसन्त अन्तःकरण में आता है, तब मनुष्य कामोन्मुख होता है। और श्रद्धा का बसन्त आने पर वह सत्संगी बनता है, संतों की सभा के प्रति उसकी रुझान बढ़ती है।
Monday, 10 August 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............
भगवान राम लक्ष्मण से विस्तार से बसन्त ऋतु का वर्णन करते हैं। चारों ओर बसन्त छायी हुई है। बसन्त ऋतु में किसी वाटिका में चले जाइए, पुष्प खिले रहते हैं, नये-नये पत्ते आये रहते हैं, सब कुछ कितना सुहावना लगता है। पर भगवान राम कहते हैं - चतुर व्यक्ति वह है जो इससे सावधान रहता है, जो समझ लेता है कि यह काम के आक्रमण की पूर्वपीठिका है। वे काम की चतुरंगिणी सेना का वर्णन करते हुए कहते हैं - पर्वतों की शिलाएँ काम के रथ हैं, जो झरने झर रहे हैं वे काम के नगाड़े हैं, पपीहे भाट हैं जो विरदावली का वर्णन करते हैं, भौंरों की गुंजार भेरी और शहनाई हैं, शीतल, मंद और सुगंधित हवा मानो दूत का कार्य लेकर आयी है। ये जो वृक्ष हैं, काम के सैनिक हैं। इस प्रकार बसन्त का चित्र प्रस्तुत करते हुए वे आगे कहते हैं - लक्ष्मण ! काम की इस सेना को देखकर जो धीर बने रहते हैं, जगत में उन्हीं की वीरों में प्रतिष्ठा होती है।
Sunday, 9 August 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...........
कहा जाता है कि काम का सेनापति है बसन्त। एक प्रसिद्ध श्लोक प्रचलित है कि वैद्यों के एक माता-पिता वे हैं जिनसे वे जन्म लेते हैं, और वैद्यों की दूसरी माता है शरद ऋतु तथा पिता हैं बसन्त। संकेत यह है कि सबसे अधिक लोग या तो शरद ऋतु में अस्वस्थ होते हैं या फिर बसन्त ऋतु से। इसलिए वैद्य लोग इन दोनों को धन्यवाद देते हैं कि आप रोगियों को हमारे पास भेजकर हमारी रक्षा करते हैं। फिर, उसका मनोवैज्ञानिक तात्पर्य यह है कि वैसे तो गर्मी में भीषण गर्मी पड़ती है और शीत में भीषण ठण्ड, पर शरद और बसन्त, ये दोनों ऋतुएँ बड़ी सुहावनी लगती हैं। तब व्यक्ति रोगी क्यों होता है ? इसलिए कि ग्रीष्म और शीत ऋतुओं में तो व्यक्ति सावधान रहता है, पर सुहावनी ऋतु आती है तो असावधान हो जाता है, इसलिए वह रोग का शिकार हो जाता है। यही स्थिति काम के संदर्भ में भी है। जिन दुर्गुणों को हम दुर्गुणों के रूप में पहचानते हैं, उनसे लड़ने के लिए तो हम सावधान रहते हैं, पर जिसका संस्पर्श हमें सुहावना लगता है, वह हममें ऐसी प्रतीति जगाता है कि वह आक्रमण करने कहाँ आ रहा है ? वह तो हमारा स्वागत करने आया हुआ है। इसलिए बसन्त को काम का सखा कहा गया है।
Saturday, 8 August 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.............
कामी की वृत्ति शिथिल पड़ जाती है, क्रोध शांत हो जाता है, पर लोभ की वृत्ति निरंतर वर्धमान है। तभी तो गोस्वामीजी ने भगवान से जो वरदान माँगा, उन्होंने कहा - कामिहि नारि पियारि जिमि। लोभिहि प्रिय जिमि दाम। - महाराज कामी का नारी के प्रति जो आकर्षण होता है, मेरा आपके प्रति वैसा ही प्रेम हो। साथ ही लोभी को जैसे धन प्यारा है, आप मुझे वैसे ही प्यारे लगें। मन में प्रश्न जगता है कि कामिहि नारि पियारि के बाद लोभिहि प्रिय जिमि दाम क्यों जोड़ा गया ? गोस्वामीजी को लगा कि कामी में पाने की तो तीव्र उत्कण्ठा होती है, पर उपलब्धि के बाद उसके अन्तःकरण में उतना आकर्षण और उत्साह नहीं रह जाता। तो कहीं भगवान को पाने के बाद उनके प्रति मेरे मन में वैसी ही न्यूनता न आ जाय, इसलिए वे बोले, प्रभो! जब तक आप मुझे नहीं मिले हैं, तब तक कामी जैसा रहूँ और जब आप मिल जायँ, तो लोभी हो जाऊँ। लोभी ही ऐसा है, जिसे प्राप्ति के पश्चात कभी भी ऐसा नहीं प्रतीत होता कि अब मुझे कुछ नहीं चाहिए।
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............
हनुमानजी रावण के बगीचे को उजाड़कर मानो मोह के बाग के रक्षक दुर्गुण, दुर्विचार रूपी राक्षसों को चुनौती देते हैं। जिस व्यक्ति ने भक्ति की कृपा से मोह का मधुर रस पा लिया है, तथा मोह के माध्यम से भी जिसके जीवन में भक्तिरस की वृद्धि हुई है, वह दुर्गुणों के विरुद्ध लड़ने से घबराता नहीं। उसे कोई भय नहीं होता। हनुमानजी सारी वाटिका को ध्वंस करते हुए राक्षसों पर जो प्रहार करते हैं, वह मानो दुर्गुण-दुर्विचारों पर प्रहार करते हैं। जब यह सूचना रावण के पास पहुँचती है, तो वह पहले अक्षय को भेजता है और बाद में मेघनाद को। रावण के पुत्र मेघनाद और अक्षयकुमार काम और लोभ के प्रतीक हैं। हनुमानजी के चरित्र में लोभ का कोई लेश नहीं था। अक्षय उसी को जीत सकता है, जिसके जीवन में कोई लोभ हो। हनुमानजी ने स्वयं अपने पास कुछ न रखकर सबको दिलाने का ही कार्य करते हैं। हनुमानजी की निर्लोभ वृत्ति का ही प्रमाण है कि उन्होंने स्वर्णमयी लंका को जलाकर नष्ट कर दिया। इसलिए उन्हें लोभ के प्रतीक अक्षयकुमार को उसके अपार सैनिकों सहित मारने में तनिक भी विलंब नहीं लगा।
Friday, 7 August 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...............
रावण ने एक पुत्र का नाम अक्षय एवं एक का मेघनाद रखा था। अक्षय कुमार लोभ का प्रतीक है और मेघनाद काम का। ये दोनों भाई हैं। रावण ने नाम भी बढ़िया चुना है। अक्षय वह जिसका कभी क्षय न हो। गोस्वामीजी ने कहा है - काम वात कफ लोभ अपारा। यह जो कफ है, वह अपार लोभ है। इसका तात्पर्य क्या है ? गोस्वामीजी ने यह अपार शब्द काम के साथ नहीं जोड़ा, क्रोध के साथ भी नहीं जोड़ा, पर लोभ के साथ जोड़ दिया। यही गोस्वामीजी की विलक्षण सावधानी है, क्योंकि न तो काम अपार हो सकता है और न क्रोध ही। कितना भी कामी क्यों न हो, पर वह सदा काम में नहीं रह सकता, कोई कितना भी बड़ा क्रोधी क्यों न हो, पर वह चौबीसों घंटे क्रोध में नहीं रह सकता, पर लोभ ऐसा है, जो जीवनभर चौबीसों घंटे अक्षय और अपार है।
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...............
हनुमानजी ने लंका की अशोक वाटिका में पहले बाग का फल खाया और बाद में उस बाग को उजाड़ दिया। यदि साधारण दृष्टि से देखें तो, तो यह बड़ा तर्क विरुद्ध कार्य लगता है। किसी वाटिका में फल खाने के बाद यह कौन सा शिष्टाचार है कि उस वाटिका को उजाड़ दिया जाए। रावण ने भी हनुमानजी से यही पूछा कि तुमने फल खाया तो खाया, पर बाग क्यों उजाड़ा? इसका एक गंभीर आध्यात्मिक तात्पर्य है। यह अशोकवाटिका क्या है? यह रावण की मोह की वाटिका है। मोह में भी मीठे फल होते हैं। गीता में अर्जुन के मन में अगर मोह उत्पन्न न होता, तो गीता जैसे फल की प्राप्ति ही न होती। रामायण में पार्वतीजी के अन्तःकरण में मोह हुआ, गरूड़ और भारद्वाज के मन में मोह हुआ, इसलिए यह रामकथा सुनने को मिली। तो हनुमानजी का अभिप्राय यह था कि मोह की वाटिका के मधुर फल तो ले लें, पर उसके बाद उस वाटिका को उजाड़ दें। यदि फल लेने के बाद मोह का नाश नहीं हुआ, तो वह अनर्थकारी होगा। गीता सुनने के बाद अर्जुन कहते हैं - नष्टो मोहः , मेरा मोह नष्ट हो गया।
Thursday, 6 August 2015
युग तुलसी श्रीरामकिंकर उवाच्..............
जब हनुमानजी सुग्रीव से मिलाने भगवान राम और लक्ष्मण को अपनी पीठ पर चढ़ा लेते हैं। प्रभु ने हनुमानजी से विनोद किया - जब दशरथजी ने मुझे गोद में उठाया था, तो तुम भी मुझे गोद में लेकर पर्वत पर चलते। पीठ पर बिठाने की क्या आवश्यकता है ? हनुमानजी ने कहा, नहीं महाराज! गोद में लेने और पीठ पर बिठाने में बड़ा अन्तर है। क्या अन्तर है ? जिसे गोद में लिया जाता है, गोद में लेने वाला उसी को पकड़े रहता है, पर जब कोई पीठ पर बैठता है, तो वही बैठाने वाले को पकड़े रहता है। दशरथजी समर्थ थे। वे आपको पकड़े रह सकते थे, पर मैं चाहता हूँ कि आप ही मुझे पकड़े रहिए। समर्थ जीव भले ही आपको धारण करे, पर मुझ जैसे व्यक्ति को आप पकड़े रहें इसी में उसका कल्याण है।
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..................
एक मीठा प्रसंग आता है। जब भगवान राम से हनुमानजी का परिचय हुआ, तो हनुमानजी ने प्रभु से प्रस्ताव किया- महाराज! पर्वत पर बन्दरों के राजा सुग्रीव रहते हैं। उनसे चलकर मित्रता कीजिए और उन्हें अभयदान दीजिए। हनुमानजी ने सारी बातें समझाकर दोनों को अपनी पीठ पर चढ़ा लिया। हनुमानजी ने कहा - प्रभो! पहले मैं समझता था कि आप जगत के कारण हैं, जो धरती का भार हरने के लिए अवतरित हुए हैं, पर जब आपके मुँह से यह निकला कि मैं सृष्टि का कारण नहीं, मैं तो दशरथ का बेटा हूँ, तो मुझे विश्वास हो गया कि यह जो नया ईश्वर है, उससे चाहे जो नाता जोड़ा जा सकता है। आप जब जगत्पिता होकर दशरथ के पुत्र बन सकते हैं, तो मुझे लगा कि सुग्रीव के मित्र भी बन सकते हैं। फिर मैंने आपको पीठ पर चढ़ाने का साहस इसलिए किया कि जब आप दशरथ के पुत्र बने, तो उन्होंने अवश्य ही आपको गोद में उठाया होगा। अतः मैंने सोचा कि जब आप गोद में बैठ सकते हैं, तो मेरी पीठ पर भी बैठ सकते हैं। गोद का आनन्द आपने ले ही लिया है, अब पीठ का आनन्द भी ले लीजिए।
Tuesday, 4 August 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्............
जब काम जीवन में नियंत्रित और मर्यादित रहता है तब हानिकारक नहीं होता, पर जब वह मर्यादा की सीमा लाँघ जाता है तब व्यक्ति और समाज को पतन की ओर ले जाता है। इसी तथ्य को स्पष्ट करने के लिए रामचरितमानस के भिन्न-भिन्न प्रसंगों में काम के विविध पक्षों का सुन्दर विश्लेषण किया गया है और यह बताया गया है कि किस रूप में उसे समाज में स्वीकार किया जाना चाहिए तथा किस रूप में उसका परित्याग होना चाहिए। एक ओर तो वह काम है, जो ब्रह्मा और देवताओं की प्रेरणा से भगवान शंकर पर आक्रमण करने आता है तथा दूसरा काम वह है, जो लंका में मेघनाद के रूप में रहता है तथा रावण की प्रेरणा से बंदरों के विरुद्ध, भगवान राम और लक्ष्मण के विरुद्ध संघर्ष करने के लिए प्रस्तुत होता है। अब यहाँ देखना होगा कि प्रथम और द्वितीय काम की प्रक्रिया में क्या अंतर है ?
युग तुलसी तुलसी श्रीरामकिंकर उवाच्..................
यदि आप बुराइयों लड़ सकते हैं, तो अवश्य लड़ें और उन्हें हरायें, पर बालि की तरह नहीं। बालि भी बुराइयों को हराता है, पर वह उन्हें खत्म नहीं करता, बल्कि बचा लेता है। जैसे, उसने रावण को हरा तो दिया, पर उसे मारा नहीं अपितु अपनी बगल में छः महीने तक दबाये रखा। इसका तात्पर्य आप समझ ही गये होंगे। छः महीने तक रावण के खाने-पीने की चिन्ता भी बालि को करनी पड़ी होगी कि रावण कहीं मरने न पाये। मतलब यह कि पुण्य ने पाप को हराने के बाद भी पाप को जीवित बनाये रखने की चिन्ता की और उस चिन्ता के पीछे मनोभाव यह था कि बालि को डर सताता था कि यदि मैं किसी को बताऊंगा कि मैंने रावण को हरा दिया है तो लोग शायद सन्देह करें, मेरी बात का विश्वास न करें, इसलिए वह रावण को बगल में दबाये घुमता रहा। यह प्रदर्शन प्रिय पुण्य है, यह मानो अपने पुण्य के दिखावे के लिए पाप को जीवित रखना है।
Monday, 3 August 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्.................
काम जिस पर आक्रमण करता था, उसे अंधा बनाता था। केवल शंकरजी ही थे, जो उसके आक्रमण के बाद अंधे नहीं बने, बल्कि उनकी आँखें और भी पैनी हो गयीं और वे पैनी आँखों से देखने लगे कि उनके अंतर्मन में क्षोभ किसने पैदा किया ? उन्होंने नेत्र खोला और देखा- अच्छा, यह काम है, जो मेरे मन में वासना की सृष्टि करना चाहता है। देवता डर के मारे सोचने लगे कि कहीं शंकरजी अपना तीसरा नेत्र न खोल दें, पर शंकरजी ने तो तीसरा नेत्र खोलने का संकल्प कर लिया था, क्योंकि वही असली और नकली की पहचान की कसौटी थी। राम और काम दोनों ही देखने में एक जैसे सुन्दर हैं, एक जैसे धनुर्धारी हैं। भगवान राम के विवाह के समय भी भगवान शंकर ने अपना तीसरा नेत्र खोला था और यहाँ पर भी उसी को खोलने का निश्चय करते हैं। उनका तात्पर्य है कि जो मेरी तीसरी आँख के सामने ज्यों का त्यों रहे, वह राम है और जो जलकर खाक हो जाय, वह काम है। तब शंकरजी ने तीसरा नेत्र खोला। उनके देखते ही काम जलकर भस्म हो गया। तात्पर्य यह है कि उन्होंने विष से विष की दवा की, काम को क्रोध से नष्ट कर दिया। उनका अभिप्राय यह है कि क्षमाशील बनिए! पर बुराई के प्रति क्षमाशील बनना उचित नहीं है। बुराई पर जितना क्रोध कर सकें उतना करें और उसे मिटाने का प्रयास करें, तभी बुराई से रक्षा हो सकती है।
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............
विवाह का निर्णय दो पात्रों में दो अलग-अलग प्रकार की प्रक्रिया उत्पन्न करता है। नारदजी ने भी विवाह की योजना बनायी और उसकी प्रक्रिया के रूप में उनका मन अत्यंत चंचल हो गया, सोचने लगे - इस समय जप-तप से तो कुछ बो नहीं सकता। हे विधाता! मुझे यह कन्या किस तरह मिलेगी ? पर यहाँ जब शंकरजी ने विवाह का निर्णय लिया तो वे पार्वतीजी के चिंतन में नहीं डूबे, अपितु सुजान शंकरजी मन को स्थिर करके श्रीराम के ध्यान में डूब गये, पर स्वार्थियों का दल शंकरजी को ध्यान में डूबते देख धैर्य खोने लगा। जो स्वार्थी होता है, वह व्यक्ति को दूध के बदले शराब पिलाने की सोचता है कि दूध से जल्दी काम नहीं बनेगा, उससे स्फूर्ति और शक्ति मिलने में तो कई दिन लगेंगे, जबकि शराब पिलाकर व्यक्ति से तुरन्त मनमाना काम लिया जा सकता है।
Sunday, 2 August 2015
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्...............
जीवन में किसी दिशा में प्रवृत्त होने की क्षमता दो प्रकार से प्राप्त होती है - राम से और काम से। संसार में आप ऐसे व्यक्ति देखेंगे, जो भक्त हैं, ईश्वरीय प्रेरणा से कार्य करते हैं, बड़े सक्रिय हैं तथा ऐसे लोग भी दिखाई देंगे, जिनके जीवन में ईश्वर से कोई सम्बन्ध नहीं, ईश्वर की कोई प्रेरणा नहीं, फिर भी वे व्यवहार में सक्रिय दिखाई देते हैं। इन दोनो में पार्थक्य क्या है? एक दूध पीकर स्वथ्यता प्राप्त करता है, तो दूसरा शराब पीकर एक झूठी स्फूर्ति। भगवान राम और काम दोनों चाहते हैं कि भगवान शंकर पार्वतीजी से विवाह करें, पर दोनों की भावनाओं में मौलिक अन्तर है।
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच्..............
एक व्यक्ति और है, जो चाहता है कि शंकरजी का विवाह पार्वतीजी से हो जाय। वह है काम, पर भगवान शंकर दोनों के प्रति अलग-अलग व्यवहार करते हैं। वे भगवान राम की तो स्तुति करते हैं, उन्हें नमन करते हैं और उनकी आज्ञा का पालन करने का वचन देते हैं और जब काम वही चेष्टा करता है, तो उसे जलाकर नष्ट कर देते हैं। ऐसा क्यों? मूलतः काम की निन्दा की जाती है। क्यों? एक दृष्टांत लें - जैसे, आप किसी व्यक्ति को दूध पिलायें और सोचें कि इससे उसकी शक्ति बढ़ेगी और वह स्वस्थ रहकर अधिक सेवा-कार्य कर सकेगा। फिर एक प्रक्रिया यह भी है कि किसी व्यक्ति से काम लेने के लिए उसे शराब पिला दें और उसमें जोश पैदा कर उससे काम लें। अब दूध की प्रक्रिया और शराब की प्रक्रिया में अन्तर है। दूध के द्वारा शरीर में जो स्फूर्ति आती है, स्वथ्यता आती है, वह क्रमिक रूप से आती है, पर जब व्यक्ति शराब पीता है, तो उसमें स्वथ्यता नहीं आती, लेकिन तत्काल उसे क्षणिक जोश का अनुभव होता है तथा वह अपने को स्वथ्य और सबल समझने लगता है।
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