भगवान शंकर ने काम को तो जलाया, पर आम को नहीं जलाया। इसका तात्पर्य क्या है ? आपने उत्तरकाण्ड में पढ़ा होगा कि काकभुशुण्डिजी सुमेरू पर्वत पर चार वृक्षों के नीचे अलग-अलग चार काम करते हैं। उसमें जब भगवान का सुंदरता और रूप का ध्यान करना होता है तो आम के वृक्ष के नीचे बैठ जाते। बड़ी सांकेतिक बात है। भगवान शंकर का तात्पर्य यह है कि आम रस का प्रतीक है और रस की अभिलाषा, रस की प्यास भला किस्में नहीं होती ? अब प्रश्न यह है कि समाज से काम को नष्ट करने के लिए क्या रस की प्यास, रस की अभिलाषा को ही मिटा दिया जाय ? शंकरजी मानो यह बताना चाहते हैं कि यह तो बस रस के सदुपयोग या दुरुपयोग का प्रश्न है। राम का ध्यान करने वाला आम के नीचे बैठा और शंकर पर आक्रमण करने वाला आम के ऊपर और जब आम के ऊपर, रस के ऊपर काम आरूढ़ हो जाए, तब शंकरजी के मत में, उस काम को जला ही देना चाहिए, पर सावधानी रखी जानी चाहिए कि रस की वृत्ति को समाप्त न किया जाए। साथ ही रति की वृत्ति को भी बचाकर रखने की चेष्टा करनी होगी। यह रति वृत्ति क्या है ? वह है मिलन की तीव्रतम उत्कण्ठा। यदि मिलन की तीव्रतम उत्कण्ठा ही सृष्टि से समाप्त हो जाए, तो साधक के मन में ईश्वर से मिलने की उत्कण्ठा कहाँ से आयेगी ? इसलिए भक्त लोग भगवान से प्रार्थना करते हैं कि प्रभु! काम को मिटा दीजिए, पर रति को बने रहने दीजिए।
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