ठग-वैद्य रोगी की दुर्बलता का अनुचित लाभ उठाते हैं, वे उसे स्वस्थ करने की चिन्ता नहीं करते, बल्कि उसे अस्वस्थ बनाये रखकर उससे पैसा ऐंठने की तिकड़म करते रहते हैं। प्रतापभानु ने मानसिक लोभ से ग्रस्त ऐसे ही महालोभी और तिकड़मी कपटमुनि को वैद्य के रूप में चुना। गोस्वामीजी कहते हैं कि कपटमुनि था तो बड़ा चमत्कारी। प्रतापभानु रात्रि के समय जब उससे पूछता है कि मैं अपने घर कैसे पहुँचूँ ? तो वह कहता है - तुम्हारा घर यहाँ से सत्तर योजन दूर है, वन है अनंत अँधेरा मार्ग है, कैसे पहुँच पाओगे ? सो जाओ। मैं तुम्हें सोते -सोते पहुँचा दूँगा। गोस्वामीजी संकेत देते हैं कि ऐसे चमत्कारों से एकदम श्रद्धालु नहीं बन जाना चाहिए, सावधानी भी रखनी चाहिए। अभिप्राय है कि अपने आप में चमत्कार महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण यह है कि चमत्कार हमें पहुँचाता कहाँ है ? कपटमुनि जो कहता है कि तुम आश्रम में सो जाओ, तुम्हारे सोते-सोते हम तुम्हें पहुँचा देंगे, इसका अभिप्राय क्या है ? यही कि हमें कुछ करना न पड़े और हमारे बिना कुछ किये हम जो चाहें प्राप्त हो जाय। लोभी की , कामी की और साधारतया प्रत्येक व्यक्ति की यही प्रवृत्ति होती है कि वह सफलता का छोटा मार्ग ढ़ूँढ़ता है।
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